अक्लिष्टबालतरुपल्लवलोभनीयम्
पीतं मया सदयमेव रतोत्सवेषु ।
बिम्बाधरं स्पृशसि चेद्भ्रमर प्रियायास्
त्वां कारयामि कमलोदरबन्धनस्थम् ॥
अक्लिष्टबालतरुपल्लवलोभनीयम्
पीतं मया सदयमेव रतोत्सवेषु ।
बिम्बाधरं स्पृशसि चेद्भ्रमर प्रियायास्
त्वां कारयामि कमलोदरबन्धनस्थम् ॥
पीतं मया सदयमेव रतोत्सवेषु ।
बिम्बाधरं स्पृशसि चेद्भ्रमर प्रियायास्
त्वां कारयामि कमलोदरबन्धनस्थम् ॥
अन्वयः
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(हे) भ्रमर, अक्लिष्टबालतरुपल्लवलोभनीयम् (तस्याः बिम्बाधरम्) रतोत्सवेषु मया सदयम् एव पीतम् । (त्वम्) प्रियायाः बिम्बाधरम् स्पृशसि चेत्, त्वाम् कमलोदरबन्धनस्थम् कारयामि ।
Summary
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O bee, her lip, as tempting as a tender, unbruised sprout, was kissed by me only gently in our moments of love. If you dare to touch my beloved's lip, I will have you imprisoned within a lotus.
पदच्छेदः
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| अक्लिष्टबालतरुपल्लवलोभनीयम् | अक्लिष्ट (√क्लिश्+क्त)–बालतरु–पल्लव–लोभनीय (√लुभ्+अनीयर्, २.१) | desirable as an unbruised sprout of a young tree |
| पीतम् | पीत (√पा+क्त, १.१) | was kissed |
| मया | अस्मद् (३.१) | by me |
| सदयम् | सदयम् | gently |
| एव | एव | only |
| रतोत्सवेषु | रतोत्सव (७.३) | in the festivals of love |
| बिम्बाधरम् | बिम्बाधर (२.१) | the bimba-like lower lip |
| स्पृशसि | स्पृशसि (√स्पृश् कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you touch |
| चेत् | चेत् | if |
| भ्रमर | भ्रमर (८.१) | O bee |
| प्रियायाः | प्रिया (६.१) | of my beloved |
| त्वाम् | युष्मद् (२.१) | you |
| कारयामि | कारयामि (√कृ +णिच् कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. एक.) | I will cause to be |
| कमलोदरबन्धनस्थम् | कमल–उदर–बन्धनस्थ (२.१) | imprisoned in the interior of a lotus |
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | क्लि | ष्ट | बा | ल | त | रु | प | ल्ल | व | लो | भ | नी | य |
| म्पी | तं | म | या | स | द | य | मे | व | र | तो | त्स | वे | षु |
| बि | म्बा | ध | रं | स्पृ | श | सि | चे | द्भ्र | म | र | प्रि | या | या |
| स्त्वां | का | र | या | मि | क | म | लो | द | र | ब | न्ध | न | स्थम् |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
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