किं तावद्व्रतिनामुपोढतपसां विघ्नैस्तपो दूषितम्
धर्मारण्यचरेषु केनचिदुत प्राणिष्वसच्चेष्टितम् ।
आहोस्वित्प्रसवो ममापचरितैर्विष्टम्भितो वीरुधाम्
इत्यारूढबहुप्रतर्कमपरिच्छेदाकुलं मे मनः ॥
किं तावद्व्रतिनामुपोढतपसां विघ्नैस्तपो दूषितम्
धर्मारण्यचरेषु केनचिदुत प्राणिष्वसच्चेष्टितम् ।
आहोस्वित्प्रसवो ममापचरितैर्विष्टम्भितो वीरुधाम्
इत्यारूढबहुप्रतर्कमपरिच्छेदाकुलं मे मनः ॥
धर्मारण्यचरेषु केनचिदुत प्राणिष्वसच्चेष्टितम् ।
आहोस्वित्प्रसवो ममापचरितैर्विष्टम्भितो वीरुधाम्
इत्यारूढबहुप्रतर्कमपरिच्छेदाकुलं मे मनः ॥
अन्वयः
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तावत् उपोढतपसां व्रतिनां तपः किं विघ्नैः दूषितम्? उत धर्मारण्यचरेषु प्राणिषु केनचित् असत् चेष्टितम्? आहोस्वित् वीरुधां प्रसवः मम अपचरितैः विष्टम्भितः? इति आरूढबहुप्रतर्कम् मे मनः अपरिच्छेदाकुलम् (अस्ति) ।
Summary
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My mind, filled with many conjectures and agitated by uncertainty, wonders: Has the penance of the ascetics, rich in austerity, been spoiled by obstacles? Or has someone misbehaved towards the creatures in the sacred forest? Or has the flowering of the creepers been hindered by my own misdeeds?
पदच्छेदः
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| किम् | किम् | Has |
| तावत् | तावत् | then |
| व्रतिनाम् | व्रतिन् (६.३) | of the ascetics |
| उपोढतपसाम् | उपोढ (उप√वह्+क्त)–तपस् (६.३) | rich in austerities |
| विघ्नैः | विघ्न (३.३) | by obstacles |
| तपः | तपस् (१.१) | the penance |
| दूषितम् | दूषित (√दूष्+णिच्+क्त, १.१) | been spoiled |
| धर्मारण्यचरेषु | धर्म–अरण्य–चर (७.३) | in the sacred forest |
| केनचित् | केनचित् (३.१) | by someone |
| उत | उत | or |
| प्राणिषु | प्राणिन् (७.३) | towards the creatures |
| असत् | असत् (१.१) | improperly |
| चेष्टितम् | चेष्टित (√चेष्ट्+क्त, १.१) | been behaved |
| आहोस्वित् | आहोस्वित् | or perhaps |
| प्रसवः | प्रसव (१.१) | the flowering |
| मम | अस्मद् (६.१) | my |
| अपचरितैः | अपचरित (३.३) | by misdeeds |
| विष्टम्भितः | विष्टम्भित (वि√स्तम्भ्+णिच्+क्त, १.१) | been hindered |
| वीरुधाम् | वीरुध् (६.३) | of the creepers |
| इति | इति | thus |
| आरूढबहुप्रतर्कम् | आरूढ (आ√रुह्+क्त)–बहु–प्रतर्क (१.१) | filled with many conjectures |
| अपरिच्छेदाकुलम् | अपरिच्छेद–आकुल (१.१) | agitated by uncertainty |
| मे | अस्मद् (६.१) | my |
| मनः | मनस् (१.१) | mind |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| किं | ता | व | द्व्र | ति | ना | मु | पो | ढ | त | प | सां | वि | घ्नै | स्त | पो | दू | षि | त |
| म्ध | र्मा | र | ण्य | च | रे | षु | के | न | चि | दु | त | प्रा | णि | ष्व | स | च्चे | ष्टि | तम् |
| आ | हो | स्वि | त्प्र | स | वो | म | मा | प | च | रि | तै | र्वि | ष्ट | म्भि | तो | वी | रु | धा |
| मि | त्या | रू | ढ | ब | हु | प्र | त | र्क | म | प | रि | च्छे | दा | कु | लं | मे | म | नः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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