विचिन्तयन्ती यमनन्यमानसा
तपोधनं वेत्सि न मामुपस्थितम् ।
स्मरिष्यति त्वां न स बोधितोऽपि सन्
कथां प्रमत्तः प्रथमं कृतामिव ॥
विचिन्तयन्ती यमनन्यमानसा
तपोधनं वेत्सि न मामुपस्थितम् ।
स्मरिष्यति त्वां न स बोधितोऽपि सन्
कथां प्रमत्तः प्रथमं कृतामिव ॥
तपोधनं वेत्सि न मामुपस्थितम् ।
स्मरिष्यति त्वां न स बोधितोऽपि सन्
कथां प्रमत्तः प्रथमं कृतामिव ॥
अन्वयः
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अनन्यमानसा (सती) यम् विचिन्तयन्ती (त्वम्) उपस्थितम् माम् तपोधनम् न वेत्सि, सः प्रमत्तः (सन्) बोधितः अपि सन् प्रथमम् कृताम् कथाम् इव त्वाम् न स्मरिष्यति।
Summary
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"Thinking of whom with a mind fixed on no other, you do not notice me, a sage, who has arrived. He, even when reminded, will not remember you, just as a drunkard does not remember a story told before."
पदच्छेदः
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| विचिन्तयन्ती | विचिन्तयन्ती (वि√चिन्त्+णिच्+शतृ, १.१) | thinking |
| यम् | यद् (२.१) | of whom |
| अनन्यमानसा | अनन्यमानस (१.१) | with a mind fixed on no other |
| तपोधनम् | तपोधन (२.१) | one whose wealth is asceticism (a sage) |
| वेत्सि | वेत्सि (√विद् कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you know/perceive |
| न | न | not |
| माम् | अस्मद् (२.१) | me |
| उपस्थितम् | उपस्थित (उप√स्था+क्त, २.१) | who has arrived |
| स्मरिष्यति | स्मरिष्यति (√स्मृ कर्तरि लृट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | he will remember |
| त्वाम् | युष्मद् (२.१) | you |
| न | न | not |
| सः | तद् (१.१) | he |
| बोधितः | बोधित (√बुध्+णिच्+क्त, १.१) | reminded |
| अपि | अपि | even |
| सन् | सत् (√अस्+शतृ, १.१) | being |
| कथाम् | कथा (२.१) | a story |
| प्रमत्तः | प्रमत्त (प्र√मद्+क्त, १.१) | a heedless/intoxicated person |
| प्रथमम् | प्रथम (२.१) | previously |
| कृताम् | कृत (√कृ+क्त, २.१) | told |
| इव | इव | like |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | चि | न्त | य | न्ती | य | म | न | न्य | मा | न | सा |
| त | पो | ध | नं | वे | त्सि | न | मा | मु | प | स्थि | तम् |
| स्म | रि | ष्य | ति | त्वां | न | स | बो | धि | तो | ऽपि | स |
| न्क | थां | प्र | म | त्तः | प्र | थ | मं | कृ | ता | मि | व |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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