क्षामक्षामकपोलमाननमुरः काठिन्यमुक्तस्तनम्
मध्यः क्लान्ततरः प्रकामविनतावंसौ छविः पाण्डुरा ।
शोच्या च प्रियदर्शना च मदनक्लिष्टेयमालक्ष्यते
पत्राणामिव शोषणेन मरुता स्पृष्टा लता माधवी ॥
क्षामक्षामकपोलमाननमुरः काठिन्यमुक्तस्तनम्
मध्यः क्लान्ततरः प्रकामविनतावंसौ छविः पाण्डुरा ।
शोच्या च प्रियदर्शना च मदनक्लिष्टेयमालक्ष्यते
पत्राणामिव शोषणेन मरुता स्पृष्टा लता माधवी ॥
मध्यः क्लान्ततरः प्रकामविनतावंसौ छविः पाण्डुरा ।
शोच्या च प्रियदर्शना च मदनक्लिष्टेयमालक्ष्यते
पत्राणामिव शोषणेन मरुता स्पृष्टा लता माधवी ॥
अन्वयः
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(अस्याः) आननम् क्षामक्षामकपोलम्, उरः काठिन्यमुक्तस्तनम्, मध्यः क्लान्ततरः, अंसौ प्रकामविनतौ, छविः पाण्डुरा। मदनक्लिष्टा इयम् शोच्या च प्रियदर्शना च, मरुता शोषणेन स्पृष्टा पत्राणाम् माधवी लता इव आलक्ष्यते।
Summary
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Her face has emaciated cheeks, her chest's breasts have lost their firmness, her waist is extremely slender, her shoulders are stooping, and her complexion is pale. Tormented by love, she appears both pitiable and lovely, like a Madhavi creeper touched by a drying wind that withers its leaves.
पदच्छेदः
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| क्षामक्षामकपोलम् | क्षामक्षाम–कपोल (२.१) | with exceedingly emaciated cheeks |
| आननम् | आनन (२.१) | face |
| उरः | उरस् (१.१) | chest |
| काठिन्यमुक्तस्तनम् | काठिन्य–मुक्त–स्तन (१.१) | whose breasts have lost their firmness |
| मध्यः | मध्य (१.१) | waist |
| क्लान्ततरः | क्लान्ततर (१.१) | more weary |
| प्रकामविनतौ | प्रकाम–विनत (१.२) | excessively stooping |
| अंसौ | अंस (१.२) | shoulders |
| छविः | छवि (१.१) | complexion |
| पाण्डुरा | पाण्डुर (१.१) | pale |
| शोच्या | शोच्य (√शुच्+ण्यत्, १.१) | pitiable |
| च | च | and |
| प्रियदर्शना | प्रिय–दर्शन (१.१) | lovely to behold |
| च | च | and |
| मदनक्लिष्टा | मदन–क्लिष्ट (√क्लिश्+क्त, १.१) | tormented by love |
| इयम् | इदम् (१.१) | she |
| आलक्ष्यते | आलक्ष्यते (आ√लक्ष् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | appears |
| पत्राणाम् | पत्र (६.३) | of leaves |
| इव | इव | like |
| शोषणेन | शोषण (३.१) | by the drying |
| मरुता | मरुत् (३.१) | by the wind |
| स्पृष्टा | स्पृष्ट (√स्पृश्+क्त, १.१) | touched |
| लता | लता (१.१) | creeper |
| माधवी | माधवी (१.१) | Madhavi |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क्षा | म | क्षा | म | क | पो | ल | मा | न | न | मु | रः | का | ठि | न्य | मु | क्त | स्त | न |
| म्म | ध्यः | क्ला | न्त | त | रः | प्र | का | म | वि | न | ता | वं | सौ | छ | विः | पा | ण्डु | रा |
| शो | च्या | च | प्रि | य | द | र्श | ना | च | म | द | न | क्लि | ष्टे | य | मा | ल | क्ष्य | ते |
| प | त्रा | णा | मि | व | शो | ष | णे | न | म | रु | ता | स्पृ | ष्टा | ल | ता | मा | ध | वी |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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