पृष्टा जनेन समदुःखसुखेन बाला
नेयं न वक्ष्यति मनोगतमाधिहेतुम् ।
दृष्टो विवृत्य बहुशोऽप्यनया सतृष्णम्
अत्रान्तरे श्रवणकातरतां गतोऽस्मि ॥
पृष्टा जनेन समदुःखसुखेन बाला
नेयं न वक्ष्यति मनोगतमाधिहेतुम् ।
दृष्टो विवृत्य बहुशोऽप्यनया सतृष्णम्
अत्रान्तरे श्रवणकातरतां गतोऽस्मि ॥
नेयं न वक्ष्यति मनोगतमाधिहेतुम् ।
दृष्टो विवृत्य बहुशोऽप्यनया सतृष्णम्
अत्रान्तरे श्रवणकातरतां गतोऽस्मि ॥
अन्वयः
AI
समदुःखसुखेन जनेन पृष्टा इयम् बाला मनोगतम् आधिहेतुम् न वक्ष्यति इति न। अनया विवृत्य बहुशः अपि सतृष्णम् दृष्टः (अहम्) अत्रान्तरे श्रवणकातरताम् गतः अस्मि।
Summary
AI
It is not that this girl, when asked by her friends who share her joys and sorrows, will not speak the cause of her mental anguish. Meanwhile, having been looked at by her longingly many times as she turned around, I have become anxious to hear it.
पदच्छेदः
AI
| पृष्टा | पृष्ट (√प्रच्छ्+क्त, १.१) | asked |
| जनेन | जन (३.१) | by the person |
| समदुःखसुखेन | सम–दुःख–सुख (३.१) | who shares her sorrow and joy |
| बाला | बाला (१.१) | the girl |
| न | न | not |
| इयम् | इदम् (१.१) | she |
| न | न | not |
| वक्ष्यति | वक्ष्यति (√वच् कर्तरि लृट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | will speak |
| मनोगतम् | मनस्–गत (२.१) | what is in her mind |
| आधिहेतुम् | आधि–हेतु (२.१) | the cause of her mental anguish |
| दृष्टः | दृष्ट (√दृश्+क्त, १.१) | seen |
| विवृत्य | विवृत्य (वि√वृत्+ल्यप्) | having turned around |
| बहुशः | बहुशः | many times |
| अपि | अपि | also |
| अनया | इदम् (३.१) | by her |
| सतृष्णम् | स–तृष्णा | with longing |
| अत्रान्तरे | अत्रान्तर | meanwhile |
| श्रवणकातरताम् | श्रवण–कातरता (२.१) | eagerness to hear |
| गतः | गत (√गम्+क्त, १.१) | have gone to |
| अस्मि | अस्मि (√अस् कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. एक.) | I am |
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पृ | ष्टा | ज | ने | न | स | म | दुः | ख | सु | खे | न | बा | ला |
| ने | यं | न | व | क्ष्य | ति | म | नो | ग | त | मा | धि | हे | तुम् |
| दृ | ष्टो | वि | वृ | त्य | ब | हु | शो | ऽप्य | न | या | स | तृ | ष्ण |
| म | त्रा | न्त | रे | श्र | व | ण | का | त | र | तां | ग | तो | ऽस्मि |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.