नेत्रे निमीलयति रोदिति याति शोकं
घ्राणं करेण विरुणद्धि विरौति चोच्चैः ।
कान्तावियोगपरिखेदितचित्तवृत्ति-
र्दृष्ट्वाध्वगः कुसुमितान्सहकारवृक्षान् ॥
नेत्रे निमीलयति रोदिति याति शोकं
घ्राणं करेण विरुणद्धि विरौति चोच्चैः ।
कान्तावियोगपरिखेदितचित्तवृत्ति-
र्दृष्ट्वाध्वगः कुसुमितान्सहकारवृक्षान् ॥
घ्राणं करेण विरुणद्धि विरौति चोच्चैः ।
कान्तावियोगपरिखेदितचित्तवृत्ति-
र्दृष्ट्वाध्वगः कुसुमितान्सहकारवृक्षान् ॥
अन्वयः
AI
कान्ता-वियोग-परिखेदित-चित्त-वृत्तिः अध्वगः कुसुमितान् सहकार-वृक्षान् दृष्ट्वा नेत्रे निमीलयति, रोदिति, शोकम् याति, करेण घ्राणम् वि-रुणद्धि, च उच्चैः वि-रौति।
Summary
AI
A traveler, his mind distressed by separation from his beloved, upon seeing the flowering mango trees, closes his eyes, weeps, experiences sorrow, blocks his nose with his hand, and cries out loudly.
सारांश
AI
खिले हुए आम के वृक्षों को देखकर विरही पथिक अपनी आँखें मूँद लेता है, रोने लगता है, शोक करता है और नाक बन्द कर ऊँचे स्वर में विलाप करता है।
पदच्छेदः
AI
| नेत्रे | नेत्र (२.२) | his two eyes |
| निमीलयति | निमीलयति (नि√मील् +णिच् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | closes |
| रोदिति | रोदिति (√रुद् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | weeps |
| याति | याति (√या कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | experiences |
| शोकम् | शोक (२.१) | sorrow |
| घ्राणम् | घ्राण (२.१) | his sense of smell |
| करेण | कर (३.१) | with his hand |
| विरुणद्धि | विरुणद्धि (वि√रुध् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | blocks |
| विरौति | विरौति (वि√रु कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | cries out |
| च | च | and |
| उच्चैः | उच्चैस् | loudly |
| कान्तावियोगपरिखेदितचित्तवृत्तिः | कान्ता–वियोग–परिखेदित–चित्तवृत्ति (१.१) | whose state of mind is distressed by separation from his beloved |
| दृष्ट्वा | दृष्ट्वा (√दृश्+क्त्वा) | having seen |
| अध्वगः | अध्वग (१.१) | the traveler |
| कुसुमितान् | कुसुमित (२.३) | the flowered |
| सहकारवृक्षान् | सहकार–वृक्ष (२.३) | mango trees |
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ने | त्रे | नि | मी | ल | य | ति | रो | दि | ति | या | ति | शो | कं |
| घ्रा | णं | क | रे | ण | वि | रु | ण | द्धि | वि | रौ | ति | चो | च्चैः |
| का | न्ता | वि | यो | ग | प | रि | खे | दि | त | चि | त्त | वृ | त्ति |
| र्दृ | ष्ट्वा | ध्व | गः | कु | सु | मि | ता | न्स | ह | का | र | वृ | क्षान् |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.