नानामनोज्ञकुसुमद्रुमभूषितान्ता-
न्हृष्टान्यपुष्टनिनदाकुलसानुदेशान् ।
शैलेयजालपरिणद्धशिलातलान्ता-
न्दृष्ट्वा जनः क्षितिभृतो मुदमेति सर्वः ॥

अन्वयः AI सर्वः जनः नाना-मनोज्ञ-कुसुम-द्रुम-भूषित-अन्तान्, हृष्ट-अन्यपुष्ट-निनद-आकुल-सानु-देशान्, शैलेय-जाल-परिणद्ध-शिलातल-अन्तान् क्षिति-भृतः दृष्ट्वा मुदम् एति।
Summary AI Seeing the mountains—their regions adorned with various charming flowering trees, their peaks filled with the sounds of joyful cuckoos, and their rocky surfaces covered with a network of moss—everyone feels joy.
सारांश AI भाँति-भाँति के सुन्दर वृक्षों, हर्षित कोयलों की गूँज और शिलाखंडों से युक्त पर्वत की तलहटियों को देखकर सभी लोग अत्यन्त प्रसन्न होते हैं।
पदच्छेदः AI
नानामनोज्ञकुसुमद्रुमभूषितान्तान्नानामनोज्ञकुसुमद्रुम–भूषितअन्त (२.३) whose regions are adorned with various charming flowering trees
हृष्टान्यपुष्टनिनदाकुलसानुदेशान्हृष्टअन्यपुष्टनिनदआकुल–सानुदेश (२.३) whose peak-regions are filled with the sounds of joyful cuckoos
शैलेयजालपरिणद्धशिलातलान्तान्शैलेयजालपरिणद्धशिलातलअन्त (२.३) whose rocky surfaces are covered with a network of moss
दृष्ट्वादृष्ट्वा (√दृश्+क्त्वा) having seen
जनःजन (१.१) person
क्षितिभृतःक्षितिभृत् (२.३) mountains
मुदम्मुद् (२.१) joy
एतिएति (√इ कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) attains
सर्वःसर्व (१.१) every
छन्दः वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११ १२ १३ १४
ना ना नो ज्ञ कु सु द्रु भू षि ता न्ता
न्हृ ष्टा न्य पु ष्ट नि दा कु सा नु दे शान्
शै ले जा रि द्ध शि ला ला न्ता
न्दृ ष्ट्वा नः क्षि ति भृ तो मु मे ति र्वः
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