सदा मनोज्ञं स्वनदुत्सवोत्सुकं
विकीर्णविस्तीर्णकलापिशोभितम् ।
ससंभ्रमालिङ्गनचुम्बनाकुलं
प्रवृत्तनृत्यं कुलमद्य बर्हिणाम् ॥
सदा मनोज्ञं स्वनदुत्सवोत्सुकं
विकीर्णविस्तीर्णकलापिशोभितम् ।
ससंभ्रमालिङ्गनचुम्बनाकुलं
प्रवृत्तनृत्यं कुलमद्य बर्हिणाम् ॥
विकीर्णविस्तीर्णकलापिशोभितम् ।
ससंभ्रमालिङ्गनचुम्बनाकुलं
प्रवृत्तनृत्यं कुलमद्य बर्हिणाम् ॥
अन्वयः
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अद्य बर्हिणां कुलं सदा मनोज्ञं स्वनत्, उत्सवोत्सुकं, विकीर्णविस्तीर्णकलापशोभितं, ससंभ्रमालिङ्गनचुम्बनाकुलं, प्रवृत्तनृत्यं अस्ति।
Summary
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Today, the flock of peacocks is always charmingly crying out, eager for festivity. Adorned with their fully spread-out tails, they are engaged in excited embracing and kissing, and have commenced their dance.
सारांश
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वर्षा ऋतु के उत्सव से हर्षित और अपने सुंदर पंखों को फैलाए हुए मोरों का झुण्ड आज निरंतर नृत्य कर रहा है। वे व्याकुल होकर एक-दूसरे का आलिंगन और चुंबन कर रहे हैं, जो मन को अत्यंत प्रिय लगता है।
ऋतुसमुच्चयटीका (अमरकीर्तिसूरिः)
सदेति ॥ अद्य वर्षर्तौ बर्हिणां मयूराणां कुलं प्रवृत्तनृत्यं प्रवृत्तं प्रारब्धं नृत्यं येन तदीदृशं वर्तते । कुलं कीदृशम् — सदा मनोज्ञं मनोहरम् । पुनः किं भूतं — सुरतस्य सम्भोगस्योत्सवस्तस्मै उत्सुकमुत्कण्ठितम् । तथा पुनः किं भूतं — विकीर्णा केशास्तद्वदाभा कान्तिर्यस्य स एवंविधो योऽसौ कलापो बर्हः विकीर्णकेशाभकलापस्तेन शोभितम् ।
कलापो भूषणे बर्हे इत्यमरः (अमरकोशः ३.३.१३६ ) । पुनः कथं — सविभ्रमं सविलासं यदालिङ्गनं पुनश्चुम्बनं तत्राकुलं सस्पृहम् । अत्र मयूरा अपि सुरतोत्सुका भवन्ति किं पुनः कामिनां वाच्यम् ॥
चन्द्रिकाटीका (मणिरामः)
सदेति ॥ सदा सर्वदा मनोज्ञं सुन्दरं स्वनच्छब्दायमानमुत्सवोत्सुकं हर्षेणोत्कण्ठितम् यद्वा उत्सवे हर्षं उत्सुकमुत्कण्ठितम् विकीर्णः प्रसारितो विस्तीर्णो लम्बमानो यः कलापो बर्हस्तेन शोभितम् । ससंभ्रमं ससंवेगं यदालिङ्गनं परिरम्भणं चुम्बनञ्च तत्राकुलं व्याकुलं बर्हिणं कलापिनां कुलं प्रवृत्तमारब्धं नृत्यं नर्तनं येन तत्तादृशमद्यास्तीत्यर्थः ॥
पदच्छेदः
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| सदा | सदा | always |
| मनोज्ञम् | मनोज्ञ (२.१) | charming |
| स्वनत् | स्वनत् (√स्वन्+शतृ, २.१) | crying |
| उत्सवोत्सुकम् | उत्सव–उत्सुक (२.१) | eager for festivity |
| विकीर्णविस्तीर्णकलापशोभितम् | विकीर्ण (वि√कॄ+क्त)–विस्तीर्ण (वि√स्तॄ+क्त)–कलाप–शोभित (२.१) | adorned with spread-out tails |
| ससंभ्रमालिङ्गनचुम्बनाकुलम् | ससंभ्रम–आलिङ्गन–चुम्बन–आकुल (२.१) | filled with excited embracing and kissing |
| प्रवृत्तनृत्यम् | प्रवृत्त (प्र√वृत्+क्त)–नृत्य (२.१) | which has commenced dancing |
| कुलम् | कुल (१.१) | the flock |
| अद्य | अद्य | today |
| बर्हिणाम् | बर्हिन् (६.३) | of peacocks |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | दा | म | नो | ज्ञं | स्व | न | दु | त्स | वो | त्सु | कं |
| वि | की | र्ण | वि | स्ती | र्ण | क | ला | पि | शो | भि | तम् |
| स | सं | भ्र | मा | लि | ङ्ग | न | चु | म्ब | ना | कु | लं |
| प्र | वृ | त्त | नृ | त्यं | कु | ल | म | द्य | ब | र्हि | णाम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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