दधति वरकुचाग्रैरुन्नतैर्हारयष्टिं
प्रतनुसितदुकूलान्यायतैः श्रोणिबिम्बैः ।
नवजलकणसेकादुद्गतां रोमराजीं
ललितवलिविभङ्गैर्मध्यदेशैश्च नार्यः ॥
दधति वरकुचाग्रैरुन्नतैर्हारयष्टिं
प्रतनुसितदुकूलान्यायतैः श्रोणिबिम्बैः ।
नवजलकणसेकादुद्गतां रोमराजीं
ललितवलिविभङ्गैर्मध्यदेशैश्च नार्यः ॥
प्रतनुसितदुकूलान्यायतैः श्रोणिबिम्बैः ।
नवजलकणसेकादुद्गतां रोमराजीं
ललितवलिविभङ्गैर्मध्यदेशैश्च नार्यः ॥
अन्वयः
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नार्यः उन्नतैः वर-कुच-अग्रैः हार-यष्टिं, आयतैः श्रोणि-बिम्बैः प्रतनु-सित-दुकूलानि, ललित-वलि-विभङ्गैः मध्य-देशैः च नव-जल-कण-सेकात् उद्गताम् रोम-राजीम् दधति ।
Summary
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Women now wear pearl necklaces on their high, excellent breasts, and fine white silk garments on their broad hips. On their waists, with their charming three folds, they bear a line of fine hair, brought forth by the sprinkling of fresh water drops.
सारांश
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स्त्रियां अपने उन्नत स्तनों पर हार धारण करती हैं, चौड़े नितम्बों पर महीन सफेद रेशमी वस्त्र पहनती हैं और वर्षा की बूंदों के स्पर्श से रोमांचित अपने उदर की सुंदर बलियों वाले भाग को सुशोभित करती हैं।
ऋतुसमुच्चयटीका (अमरकीर्तिसूरिः)
दधतीति ॥ नार्यः उन्नतैः कुचसमुद्गैः कुचाः स्तनाः एव समुद्गाः सम्पुटाः कुचसमुद्गास्तैर्हारयष्टिं मुक्ताहारं दधति धारयन्ति । पुनरायतैः विस्तीर्णैः श्रोणिबिम्बैः कटिप्रदेशैः । रुचिरतर दुकूलानि दधति धारयन्ति । अतिशयेन रुचिराणि रुचिरतराणि ईदृशानि यानि दुकूलानि क्षौमाणि तानि च पुनर्मध्यदेशैः तनुमध्यप्रदेशैः रोमराजिं दधति । रोम्णां राजिः श्रेणिः रोमराजिस्ताम् । किं भूतैः मध्यदेशैः — तिसृभिर्वलिभिर्ललिता मनोहरा शोभा येषां तैः। पुनः किं — नवजललवसेकादुद्गतां नवाः प्रत्यग्रा ये जललवास्तेषां सेकः सिञ्चनं तस्मादुत्पन्नाम् । एतैर्नार्यो विशेषतो मनोहारिण्यो भवन्तीत्यर्थः ॥
चन्द्रिकाटीका (मणिरामः)
दधतीति ॥ नार्यः स्त्रिय उन्नतैरुर्ध्वमुखैर्वरा उत्तमाः पीना वर्तुलाश्चेति यावत् । ये कुचाः स्तनास्तेषामग्रैरग्रभागैर्हारयष्टिं मुक्ताहारमायतैर्दीर्घैः श्रोणिबिम्बैः कटिपश्चाद्भागैः प्रतनूनि सूक्ष्माणि सितानि श्वेतवर्णानि यानि दुकूलानि वस्त्राणि तानि ललितानां सुन्दराणां वलीनां त्रिवलीनां विभङ्गा येषु तैस्तथोक्तैर्मध्यदेशैर्नवानां जलकणानां सेकादुद्गतामुत्पन्नां रोमराजीं रोमाञ्चपङ्क्तिं दधतीत्यर्थः ॥
पदच्छेदः
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| दधति | दधति (√धा कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | wear |
| वरकुचाग्रैः | वर–कुच–अग्र (३.३) | on their excellent breasts |
| उन्नतैः | उन्नत (उद्√नम्+क्त, ३.३) | high |
| हारयष्टिम् | हार–यष्टि (२.१) | a pearl necklace |
| प्रतनुसितदुकूलानि | प्रतनु–सित–दुकूल (२.३) | fine white silk garments |
| आयतैः | आयत (आ√यम्+क्त, ३.३) | on their broad |
| श्रोणिबिम्बैः | श्रोणि–बिम्ब (३.३) | hips |
| नवजलकणसेकात् | नव–जल–कण–सेक (५.१) | from the sprinkling of fresh water drops |
| उद्गताम् | उद्गत (उद्√गम्+क्त, २.१) | brought forth |
| रोमराजीम् | रोम–राजी (२.१) | a line of fine hair |
| ललितवलिविभङ्गैः | ललित–वलि–विभङ्ग (३.३) | with charming folds |
| मध्यदेशैश्च | मध्य–देश (३.३)–च | and on their waists |
| नार्यः | नारी (१.३) | women |
छन्दः
मालिनी [१५: ननमयय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| द | ध | ति | व | र | कु | चा | ग्रै | रु | न्न | तै | र्हा | र | य | ष्टिं |
| प्र | त | नु | सि | त | दु | कू | ला | न्या | य | तैः | श्रो | णि | बि | म्बैः |
| न | व | ज | ल | क | ण | से | का | दु | द्ग | तां | रो | म | रा | जीं |
| ल | लि | त | व | लि | वि | भ | ङ्गै | र्म | ध्य | दे | शै | श्च | ना | र्यः |
| न | न | म | य | य | ||||||||||
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