शिरसि बकुलमालां मालतीभिः समेतां
विकसितनवपुष्पैर्यूथिकाकुड्मलैश्च ।
विकचनवकदम्बैः कर्णपूरं वधूनां
रचयति जलदौघः कान्तवत्काल एषः ॥
शिरसि बकुलमालां मालतीभिः समेतां
विकसितनवपुष्पैर्यूथिकाकुड्मलैश्च ।
विकचनवकदम्बैः कर्णपूरं वधूनां
रचयति जलदौघः कान्तवत्काल एषः ॥
विकसितनवपुष्पैर्यूथिकाकुड्मलैश्च ।
विकचनवकदम्बैः कर्णपूरं वधूनां
रचयति जलदौघः कान्तवत्काल एषः ॥
अन्वयः
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एषः जलद-ओघः कान्तवत् वधूनां शिरसि मालतीभिः समेतां बकुल-मालां, विकसित-नव-पुष्पैः यूथिका-कुड्मलैः च, विकच-नव-कदम्बैः कर्णपूरं च रचयति।
Summary
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This season, the mass of clouds, acting like a lover, fashions ornaments for the young women: a garland of Bakula flowers interwoven with Malati blossoms and buds of Yuthika with their newly opened flowers on their heads, and an ear-ornament with fresh, blossomed Kadamba flowers.
सारांश
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वर्षा का यह समय किसी प्रेमी के समान स्त्रियों के सिर पर मौलसिरी, मालती, खिले हुए नए फूलों और जूही की कलियों की मालाएं सजाता है तथा उनके कानों में खिले हुए नए कदंब के फूलों के कुंडल पहनाता है।
ऋतुसमुच्चयटीका (अमरकीर्तिसूरिः)
शिरसीति ॥ एषः समीपवर्ती वर्षाऋतुसम्बन्धी काले वधूनां कर्णपूरं कर्णाभरणम् । रचयति नवीनमुत्पादयति । कैः — विकचा विकासमाप्ता ये नवकदम्बा नूतनकदम्बवृक्षा विकचनवकदम्बास्तैः । नव शब्देन सुन्दरता सूचिता । अथ च पुनर्वधूनां शिरसि शिरोनिमित्तं बकुलानामशोकवृक्षपुष्पाणां माला बकुलमाला तां करोति निष्पादयति । किं भूतां बकुलमालाम् — मालतीभिर्मालिनीपुष्पैः समेतां संयुक्ताम् । पुनः किं भूतैः — कुसुमितानि विकसितानि यानि वनपुष्पाणि तैः। यूथिकायाः कुड्मलानि कलिकास्तैः समेतां मिश्रिताम् ।
कुड्मलो मुकुलोऽस्त्रियाम् इत्यमरः (अमरकोशः २.४.१६ ) । किं कालः — जलदस्य मेघस्यौघः समूहो विद्यतेऽस्मिन्निति जलदौघः । किं तत् — कान्तवत् भर्तृवत् । यथा कान्तः कामिनीनां कर्णपूरं मालाञ्च रचयति ॥
चन्द्रिकाटीका (मणिरामः)
शिरसीति ॥ जलदानां मेघानामोघः सङ्घातो यस्मिन् स तथोक्तः ।
स्तोमौघनिकरव्रातवारसङ्घातसञ्चयाः इत्यमरः (अमरकोशः २.५.४२ ) । एषः कालो वर्षाकालः कान्तवत् प्रियवद् वधूनां स्त्रीणां शिरसि मूर्धनि मालतीभिर्मालतीकुसुमैः । समेतां युक्तां बकुलमालां केसरस्रजं रचयति करोति तथा विकसितनवपुष्पैः संफ़ुल्लनूतनकुसुमैर्यूथिकाया मागधीलतायाः कुड्मलानि मुकुलानि तैः । अथ मागधी । गणिका यूथिकाम्बष्ठाः इत्यमरः (अमरकोशः २.४.७१ ) । कुड्मलो मुकुलोऽस्त्रियाम् इत्यमरः (अमरकोशः २.४.१६ ) । विकचानि विकसितानि नवानि नूतनानि यानि कदम्बानि कदम्बकुसुमानि तैश्च कर्णपूरं कर्णावतंसं रचयति करोतीत्यर्थः ॥
पदच्छेदः
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| शिरसि | शिरस् (७.१) | on the head |
| बकुलमालाम् | बकुल–माला (२.१) | a garland of Bakula flowers |
| मालतीभिः | मालती (३.३) | with Malati flowers |
| समेताम् | समेत (सम्√इ+क्त, २.१) | accompanied |
| विकसितनवपुष्पैः | विकसित (वि√कस्+क्त)–नव–पुष्प (३.३) | with newly opened flowers |
| यूथिकाकुड्मलैश्च | यूथिका–कुड्मल (३.३)–च | and with buds of Yuthika |
| विकचनवकदम्बैः | विकच–नव–कदम्ब (३.३) | with fresh, blossomed Kadamba flowers |
| कर्णपूरम् | कर्ण–पूर (२.१) | an ear-ornament |
| वधूनाम् | वधू (६.३) | of the young women |
| रचयति | रचयति (√रच् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | fashions |
| जलदौघः | जलद–ओघ (१.१) | the mass of clouds |
| कान्तवत् | कान्तवत् | like a lover |
| कालः | काल (१.१) | the season |
| एषः | एतद् (१.१) | this |
छन्दः
मालिनी [१५: ननमयय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| शि | र | सि | ब | कु | ल | मा | लां | मा | ल | ती | भिः | स | मे | तां |
| वि | क | सि | त | न | व | पु | ष्पै | र्यू | थि | का | कु | ड्म | लै | श्च |
| वि | क | च | न | व | क | द | म्बैः | क | र्ण | पू | रं | व | धू | नां |
| र | च | य | ति | ज | ल | दौ | घः | का | न्त | व | त्का | ल | ए | षः |
| न | न | म | य | य | ||||||||||
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