मुदित इव कदम्बैर्जातपुष्पैः समन्ता-
त्पवनचलितशाखैः शाखिभिर्नृत्यतीव ।
हसितमिव विधत्ते सूचिभिः केतकीनां
नवसलिलनिषेकच्छिन्नतापो वनान्तः ॥
मुदित इव कदम्बैर्जातपुष्पैः समन्ता-
त्पवनचलितशाखैः शाखिभिर्नृत्यतीव ।
हसितमिव विधत्ते सूचिभिः केतकीनां
नवसलिलनिषेकच्छिन्नतापो वनान्तः ॥
त्पवनचलितशाखैः शाखिभिर्नृत्यतीव ।
हसितमिव विधत्ते सूचिभिः केतकीनां
नवसलिलनिषेकच्छिन्नतापो वनान्तः ॥
अन्वयः
AI
नव-सलिल-निषेक-छिन्न-तापः वन-अन्तः समन्तात् जातपुष्पैः कदम्बैः मुदितः इव, पवन-चलित-शाखैः शाखिभिः नृत्यति इव, केतकीनां सूचिभिः हसितम् इव विधत्ते ।
Summary
AI
The forest region, its heat dispelled by the sprinkling of fresh rainwater, seems joyful with the newly blossomed Kadamba trees all around. It appears to be dancing with its trees whose branches are swayed by the wind, and seems to be smiling through the sharp points of the Ketaki flowers.
सारांश
AI
चारों ओर खिले कदंब के पुष्पों से प्रसन्न और वायु से हिलती शाखाओं वाले वृक्षों के कारण वन प्रदेश मानो नृत्य कर रहा है; केतकी के अग्रभागों से वह मुस्करा रहा है और वर्षा की नई बूंदों से उसका ताप शांत हो गया है।
ऋतुसमुच्चयटीका (अमरकीर्तिसूरिः)
मुदित इति ॥ वनस्यान्तो वनान्तः शालिभिर्वृक्षैर्नृत्यतीव नृत्यं करोतीव । किं — पवनेन वायुना चलिताः कम्पिताः शाखा येषां तैः । किं भूतो वनान्तः — समन्तात् समस्तप्रकारेण जातपुष्पैः जातान्युत्पन्नानि पुष्पाणि येषु ते जातपुष्पास्तैः कदम्बैः कदम्बवृक्षैर्मुदित इव । उत्प्रेक्षते उत्पन्नहर्ष इव । यथा हर्षितः पुमान् रोमाञ्चयुक्तो भवति तथाऽत्र विकसितपुष्पाः कदम्बवृक्षा रोमाञ्च सदृशा ज्ञेयाः । पुनः — केतकीनां सूचिभिः कुसुमैः हास्यं विधत्त इव । उत्प्रेक्षते हास्यं करोतीव । केतकीनां पुष्पाणि धवलानि भवन्ति हास्यमपि धवलं वर्ण्यतेऽतः साम्यं । किं भूत वनाः — नवसलिलनिषेकोत्खाततापः नवञ्च तत् सलिलञ्च नवसलिलमर्थान्मेघवर्षणजलं तस्य निषेकः सिञ्चनं तेनोत्खात उन्मूलितो दूरीकृतस्तापो यस्य सः ॥
चन्द्रिकाटीका (मणिरामः)
मुदित इति ॥ नवस्य नूतनस्य सलिलस्य निषेकेण सेवनेन छिन्न उच्छिन्नस्तापो यस्य स तथोक्तो वनान्तोऽरण्यप्रान्तो जातपुष्पैः प्रादुर्भूतकुसुमैः कदम्बैर्नीपवृक्षैर्मुदित इव समन्तादितस्ततः पवनेन वायुना चलिताः कम्पिताः शाखा यैस्तथोक्तैः शाखाभिर्वृक्षैः ।
वृक्षो महीरुहः शाखी विटपी पादपस्तरुः इत्यमरः (अमरकोशः २.४.५ ) । नृत्यतीव नृत्यं करोतीवेत्युत्प्रेक्षा । एवमन्यत्रापि । केतकीनां सूचीभिः कण्टकैर्हसितमिव हास्यमिव विधत्ते विदधातीत्यर्थः ॥
पदच्छेदः
AI
| मुदितः | मुदित (√मुद्+क्त, १.१) | joyful |
| इव | इव | as if |
| कदम्बैः | कदम्ब (३.३) | with Kadamba trees |
| जातपुष्पैः | जात (√जन्+क्त)–पुष्प (३.३) | with blossomed flowers |
| समन्तात् | समन्तात् | all around |
| पवनचलितशाखैः | पवन–चलित (√चल्+क्त)–शाखा (३.३) | with branches swayed by the wind |
| शाखिभिः | शाखिन् (३.३) | with the trees |
| नृत्यति | नृत्यति (√नृत् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | dances |
| इव | इव | as if |
| हसितम् | हसित (√हस्+क्त, २.१) | a smile |
| इव | इव | as if |
| विधत्ते | विधत्ते (वि√धा कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | makes |
| सूचिभिः | सूचि (३.३) | with the sharp points |
| केतकीनाम् | केतकी (६.३) | of the Ketaki flowers |
| नवसलिलनिषेकच्छिन्नतापः | नव–सलिल–निषेक–छिन्न (√छिद्+क्त)–ताप (१.१) | whose heat is dispelled by the sprinkling of fresh water |
| वनान्तः | वनान्त (१.१) | the forest region |
छन्दः
मालिनी [१५: ननमयय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मु | दि | त | इ | व | क | द | म्बै | र्जा | त | पु | ष्पैः | स | म | न्ता |
| त्प | व | न | च | लि | त | शा | खैः | शा | खि | भि | र्नृ | त्य | ती | व |
| ह | सि | त | मि | व | वि | ध | त्ते | सू | चि | भिः | के | त | की | नां |
| न | व | स | लि | ल | नि | षे | क | च्छि | न्न | ता | पो | व | ना | न्तः |
| न | न | म | य | य | ||||||||||
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.