पयोधरैर्भीमगभीरनिस्वनै-
स्तडिद्भिरुद्वेजितचेतसो भृशम् ।
कृतापराधानपि योषितः प्रिया-
न्परिष्वजन्ते शयने निरन्तरम् ॥
पयोधरैर्भीमगभीरनिस्वनै-
स्तडिद्भिरुद्वेजितचेतसो भृशम् ।
कृतापराधानपि योषितः प्रिया-
न्परिष्वजन्ते शयने निरन्तरम् ॥
स्तडिद्भिरुद्वेजितचेतसो भृशम् ।
कृतापराधानपि योषितः प्रिया-
न्परिष्वजन्ते शयने निरन्तरम् ॥
अन्वयः
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भीमगभीरनिस्वनैः पयोधरैः तडिद्भिः च भृशम् उद्वेजितचेतसः योषितः कृतापराधान् अपि प्रियान् शयने निरन्तरं परिष्वजन्ते।
Summary
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Their hearts greatly agitated by the terrible, deep sounds of the clouds and by the flashes of lightning, women tightly embrace their lovers in bed, even those who have committed offenses.
सारांश
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बादलों के भयानक और गंभीर गर्जन तथा बिजली की चमक से भयभीत स्त्रियां, अपने उन प्रियतमों का भी आलिंगन कर रही हैं जिन्होंने अपराध किया है, और शैया पर उनसे निरंतर लिपटी हुई हैं।
ऋतुसमुच्चयटीका (अमरकीर्तिसूरिः)
पयोधरैरिति ॥ योषितः स्त्रियः कृतापराधान् । कृता अपराधाः अन्ययोषिद्गमनादिरूपा यैस्ते । इदृशानपि प्रियान् भर्तॄन् शयने शय्यायां निरन्तरमनवरतम् परिष्वजन्ते आलिङ्गन्ति । कथं भूता योषितः — पयोधरैर्मेघैः भृशमुद्वेजितवेतसः उद्वेजितं पीडितं चेतो यासां ताः । किं भूतैः पयोधरैः — भीमो भयकृत् पुनर्गभीरश्च निःस्वनः शब्दो येषां तैः । किं कुर्वद्भिः — स्वनद्भिः शब्दायमानैः । अनेनात्र कामोद्रेकः सूचितः ॥
चन्द्रिकाटीका (मणिरामः)
पयोधरैरिति ॥ भीमो भयानको गभीरो गम्भीरो निःस्वनो निर्घोषो येषां तैस्तथोक्तैः ।
स्वाननिर्घोषनिह्रादनादनिस्वाननिस्वनाः इत्यमरः (अमरकोशः १.६.२५ ) । पयोधरैर्मेघैस्तडिद्भिर्विद्युद्भिश्च भृशमत्यन्तमुद्वेजितमुद्विग्नं चेतोऽन्तःकरणं यासां तास्तथोक्ता योषितो नार्यः । स्त्री योषिदबला योषा नारी सीमन्तिनी वधूः इत्यमरः (अमरकोशः २.६.२ ) । कृतोऽपराधोऽन्यायः परवनितानिरीक्षणादिर्यैस्तांस्तथोक्तानपि प्रियान् शयने निरन्तरं निरवकाशं यथा भवति तथा परिष्वजन्ते आलिङ्गन्ते इत्यर्थः ॥
पदच्छेदः
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| पयोधरैः | पयोधर (३.३) | by clouds |
| भीमगभीरनिस्वनैः | भीम–गभीर–निस्वन (३.३) | with terrible, deep sounds |
| तडिद्भिः | तडित् (३.३) | by lightning flashes |
| उद्वेजितचेतसः | उद्वेजित (उत्√विज्+णिच्+क्त)–चेतस् (१.३) | whose hearts are agitated |
| भृशम् | भृशम् | greatly |
| कृतापराधान् | कृत–अपराध (२.३) | who have committed offenses |
| अपि | अपि | even |
| योषितः | योषित् (१.३) | women |
| प्रियान् | प्रिय (२.३) | their lovers |
| परिष्वजन्ते | परिष्वजन्ते (परि√स्वञ्ज् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | they embrace |
| शयने | शयन (७.१) | in bed |
| निरन्तरम् | निरन्तरम् | tightly |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प | यो | ध | रै | र्भी | म | ग | भी | र | नि | स्व | नै |
| स्त | डि | द्भि | रु | द्वे | जि | त | चे | त | सो | भृ | शम् |
| कृ | ता | प | रा | धा | न | पि | यो | षि | तः | प्रि | या |
| न्प | रि | ष्व | ज | न्ते | श | य | ने | नि | र | न्त | रम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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