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इन्द्रियार्थपरिशून्यमक्षमः
सोढुमेकमपि स क्षणान्तरम् ।
अन्तरेव विहरन्दिवानिशं
न व्यपैक्षत समुत्सुकाः प्रजाः ॥

अन्वयः AI सः इन्द्रिय-अर्थ-परिशून्यम् एकम् क्षण-अन्तरम् अपि सोढुम् अक्षमः (सन्) दिवानिशम् अन्तः एव विहरन् समुत्सुकाः प्रजाः न व्यपैक्षत।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) इन्द्रियेति॥ इन्द्रियार्थपरिशून्यं शब्दादिविषयरहितमेकमपि क्षणान्तरं क्षणभेदं सोढुमक्षमोऽशक्तः सोऽग्निवर्णो दिवानिशमन्तरेव विहरन् समुत्सुका दर्शनाकाङ्क्षिणीः प्रजा न व्यपैक्षत नापेक्षितवान् ॥
Summary AI Unable to endure even a single moment devoid of sensual pleasures, he sported day and night only inside the palace and paid no heed to his subjects, who were eager to see him.
सारांश AI वह इंद्रिय सुखों के बिना एक क्षण भी नहीं रह सकता था, इसलिए दिन-रात महलों के भीतर ही विहार करता रहा और अपनी दर्शन-अभिलाषी प्रजा की पूरी तरह उपेक्षा की।
पदच्छेदः AI
इन्द्रियार्थपरिशून्यम्इन्द्रियअर्थपरिशून्य (२.१) devoid of sensual pleasures
अक्षमःअक्षम (१.१) unable
सोढुम्सोढुम् (√सह्+तुमुन्) to endure
एकम्एक (२.१) one
अपिअपि even
सःतद् (१.१) he
क्षणान्तरम्क्षणअन्तर (२.१) a moment
अन्तःअन्तः inside
एवएव only
विहरन्विहरत् (वि√हृ+शतृ, १.१) sporting
दिवानिशम्दिवानिशम् day and night
not
व्यपैक्षतव्यपैक्षत (वि+अप√ईक्ष् कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) did he heed
समुत्सुकाःसमुत्सुक (२.३) eager (to see him)
प्रजाःप्रजा (२.३) the subjects
छन्दः रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
न्द्रि या र्थ रि शू न्य क्ष मः
सो ढु मे पि क्ष णा न्त रम्
न्त रे वि न्दि वा नि शं
व्य पै क्ष मु त्सु काः प्र जाः
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