तं पयोधरनिषिक्तचन्दनै-
र्मौक्तिकग्रथितचारुभूषणैः ।
ग्रीष्मवेषविधिभिः सिषेविरे
श्रोणिलम्बिमणिमेखलैः प्रियाः ॥
तं पयोधरनिषिक्तचन्दनै-
र्मौक्तिकग्रथितचारुभूषणैः ।
ग्रीष्मवेषविधिभिः सिषेविरे
श्रोणिलम्बिमणिमेखलैः प्रियाः ॥
र्मौक्तिकग्रथितचारुभूषणैः ।
ग्रीष्मवेषविधिभिः सिषेविरे
श्रोणिलम्बिमणिमेखलैः प्रियाः ॥
अन्वयः
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प्रियाः पयोधर-निषिक्त-चन्दनैः मौक्तिक-ग्रथित-चारु-भूषणैः श्रोणि-लम्बि-मणि-मेखलैः ग्रीष्म-वेष-विधिभिः तम् सिषेविरे।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
तमिति॥ प्रियाः पयोधऱेषु स्तनेषु निषिक्तमुक्षितं चन्दनं येषु तैः। मौक्तिकैर्ग्रथितानि प्रोतानि चारुभूषणानि येषु तैः। मुक्ताप्रायाभरणैरित्यर्थः। श्रोणिलम्बिन्यो मणिमेखला मरकतादिमणियुक्तकटिसूत्राणि येषु तादृशैर्ग्रीष्मवेषविधइनिरुष्णकालोचितनेपथ्यविधानैः। शीतलोपायैरित्यर्थः । तमग्निवर्णं सिषेविरे ॥
Summary
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His beloveds attended to him with their summer attire. This included sandalwood paste sprinkled on their breasts, beautiful ornaments strung with pearls, and jeweled girdles hanging low on their hips.
सारांश
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ग्रीष्म ऋतु में प्रियों ने अपने स्तनों पर चंदन का लेप लगाकर, मोतियों के आभूषण और कमर में मणिमयी मेखला धारण कर राजा की सेवा की।
पदच्छेदः
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| तम् | तद् (२.१) | him |
| पयोधरनिषिक्तचन्दनैः | पयोधर–निषिक्त–चन्दन (३.३) | with sandalwood paste sprinkled on the breasts |
| मौक्तिकग्रथितचारुभूषणैः | मौक्तिक–ग्रथित–चारु–भूषण (३.३) | with beautiful ornaments strung with pearls |
| ग्रीष्मवेषविधिभिः | ग्रीष्म–वेष–विधि (३.३) | with the arrangements of summer attire |
| सिषेविरे | सिषेविरे (√सेव् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | they served |
| श्रोणिलम्बिमणिमेखलैः | श्रोणि–लम्बिन्–मणि–मेखला (३.३) | with jeweled girdles hanging on the hips |
| प्रियाः | प्रिया (१.३) | his beloveds |
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| तं | प | यो | ध | र | नि | षि | क्त | च | न्द | नै |
| र्मौ | क्ति | क | ग्र | थि | त | चा | रु | भू | ष | णैः |
| ग्री | ष्म | वे | ष | वि | धि | भिः | सि | षे | वि | रे |
| श्रो | णि | ल | म्बि | म | णि | मे | ख | लैः | प्रि | याः |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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