अन्वयः
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असौ रात्रि-जागर-परः दिवा-शयः (सन्) योषिताम् (सकाशात्) उडुपतेः अर्चिषाम् इव स्पर्श-निर्वृत्तिम् अवाप्नुवन् कुमुद-आकर-उपमाम् (शय्याम्) आरुरोह।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
योषितामिति॥ उडुपतेरिन्दोरर्चिषां भासामिव।
ज्वाला भासो न पुंस्यर्चिः इत्यमरः। योषितां स्पर्शनिर्वृत्तिं स्पर्शसुखमवाप्नुवन्। किंच, रात्रिषु जागरपरः। दिवा दिवसेषु शेते स्वपितीति दिवाशयः। अधिकरणे क्षेतेः (अष्टाध्यायी ३.२.१५ ) इत्यच्प्रत्ययः। असावग्निवर्णः कुमुदाकरस्योपमां साम्यम्। आरुरोह प्राप ॥
Summary
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Devoted to staying awake at night and sleeping by day, he obtained from the women a bliss of touch like that from the rays of the moon. Thus obtaining, he ascended his bed, which was like a bed of water lilies.
सारांश
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स्त्रियों के स्पर्श से आनंदित होकर राजा चंद्रमा की तरह रात भर जागता और दिन में सोता था, जिससे वह कुमुदिनी के समान प्रतीत होता था।
पदच्छेदः
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| योषिताम् | योष् (६.३) | of the women |
| उडुपतेः | उडु (६.१)–पति | of the moon |
| इव | इव | like |
| अर्चिषाम् | अर्चिस् (६.३) | of the rays |
| स्पर्शनिर्वृत्तिम् | स्पर्श–निर्वृत्ति (२.१) | the bliss of touch |
| असौ | अदस् (१.१) | he |
| अवाप्नुवन् | अवाप्नुवत् (अव√आप्+शतृ, १.१) | obtaining |
| आरुरोह | आरुरोह (आ√रुह् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | he ascended |
| कुमुदाकरोपमाम् | कुमुद–आकर–उपमा (२.१) | which was like a bed of water lilies |
| रात्रिजागरपरः | रात्रि–जागर–पर (१.१) | he who was devoted to staying awake at night |
| दिवाशयः | दिवा–शय (१.१) | he who slept by day |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| यो | षि | ता | मु | डु | प | ते | रि | वा | र्चि | षां |
| स्प | र्श | नि | र्वृ | त्ति | म | सा | व | वा | प्नु | वन् |
| आ | रु | रो | ह | कु | मु | दा | क | रो | प | मां |
| रा | त्रि | जा | ग | र | प | रो | दि | वा | श | यः |
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