अन्वयः
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निदय-रति-श्रम-अलसाः योषितः कण्ठ-सूत्रम् अपदिश्य तस्य पीवर-स्तन-विलुप्त-चन्दनम् बृहत्-भुज-अन्तरम् अध्यशेरत।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
तस्येति॥ निर्दयरतिश्रमेणालसा निश्चेष्टा योषितः कण्ठसूत्रमालिङअगनविशेषमषदिश्य व्याजीकृत्य पीवरस्तनाभ्यां विलुप्तचन्दनं प्रमृष्टाङ्गरागं तस्याग्निवर्णस्य बृहद्भुजान्तरमध्यशेरत वक्षःस्थले शेरते स्म। कण्ठसूत्रलक्षणं तु -
यत्कुर्वते वक्षसि वल्लभस्य स्तनाभिघातं निबिडोपगूढम्। परिश्रमार्थं शनकैर्विदग्धास्तत्कण्ठसूत्रं प्रवदन्ति सन्तः। इदमेव रतिरहस्ये स्तनालिङ्गनमित्युक्तम्। तथा हि-उरसि कमितुरुञ्चैरादिशन्ती वराङ्गी स्तन्युगमुपधत्ते यत्स्तनालिङ्गनं तत् इति ॥
Summary
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Languid from the fatigue of intense lovemaking, the women, on the pretext of adjusting their necklaces, lay upon his broad chest, from which the sandalwood paste had been rubbed away by their full breasts.
सारांश
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रति-क्रीड़ा से थकी हुई स्त्रियाँ हार ठीक करने के बहाने राजा की विशाल छाती पर लेट गईं, जिससे उनके स्तनों के स्पर्श से राजा का चंदन पुछ गया।
पदच्छेदः
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| तस्य | तद् (६.१) | his |
| निदयरतिश्रमालसाः | निदय–रति–श्रम–अलसा (१.३) | languid from the fatigue of intense love-making |
| कण्ठसूत्रम् | कण्ठ–सूत्र (२.१) | a necklace |
| अपदिश्य | अपदिश्य (अप√दिश्+ल्यप्) | using as a pretext |
| योषितः | योष् (१.३) | the women |
| अध्यशेरत | अध्यशेरत (अधि√शी कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | they lay upon |
| बृहद्भुजान्तरम् | बृहत्–भुज–अन्तर (२.१) | the broad space between his arms |
| पीवरस्तनविलुप्तचन्दनम् | पीवर–स्तन–विलुप्त–चन्दन (२.१) | from which sandalwood paste was rubbed off by plump breasts |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | स्य | नि | द | य | र | ति | श्र | मा | ल | साः |
| क | ण्ठ | सू | त्र | म | प | दि | श्य | यो | षि | तः |
| अ | ध्य | शे | र | त | बृ | ह | द्भु | जा | न्त | रं |
| पी | व | र | स्त | न | वि | लु | प्त | च | न्द | नम् |
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