प्रेक्ष्य दर्पणतलस्थमात्मनो
राजवेषमतिशक्रशोभिनम् ।
पिप्रिये न स तथा यथा युवा
व्यक्तलक्ष्म परिभोगमण्डनम् ॥

अन्वयः AI सः युवा दर्पण-तल-स्थम् अति-शक्र-शोभिनम् आत्मनः राज-वेषम् प्रेक्ष्य तथा न पिप्रिये, यथा व्यक्त-लक्ष्म परिभोग-मण्डनम् (प्रेक्ष्य पिप्रिये)।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) प्रेक्ष्येति॥ युवा सोग्निवर्णोऽतिशक्रं यथा तथा शोभमानमतिशक्रशोभिनं तर्पणतलस्थं दर्पणसंक्रान्तम्। आत्मनो राजवेषं प्रेक्ष्य तथा न पिप्रिये न तुतोष यथा व्यक्तलक्ष्म प्रकटचिह्नं परिभोगमण्डनं प्रेक्ष्य पिप्रिये ॥
Summary AI Seeing his own royal attire, which outshone even Indra's, reflected in a mirror, the young king was not as pleased as he was on seeing the ornamentation of love-marks, the visible signs of his amorous enjoyment.
सारांश AI दर्पण में इंद्र के समान वैभवशाली राजसी वेश को देखकर राजा उतना प्रसन्न नहीं होता था, जितना वह अपने शरीर पर बने संभोग के निशानों को देखकर होता था।
पदच्छेदः AI
प्रेक्ष्यप्रेक्ष्य (प्र√ईक्ष्+ल्यप्) having seen
दर्पणतलस्थम्दर्पणतलस्थ (२.१) reflected in the surface of a mirror
आत्मनःआत्मन् (६.१) of himself
राजवेषम्राजन्वेष (२.१) the royal attire
अतिशक्रशोभिनम्अतिशक्रशोभिन् (२.१) shining more than Indra
पिप्रियेपिप्रिये (√प्री कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) he was pleased
not
सःतद् (१.१) he
तथातथा so
यथायथा as
युवायुवन् (१.१) the young man
व्यक्तलक्ष्मव्यक्तलक्ष्मन् (२.१) with visible marks
परिभोगमण्डनम्परिभोगमण्डन (२.१) the ornamentation from enjoyment
छन्दः रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
प्रे क्ष्य र्प स्थ मा त्म नो
रा वे ति क्र शो भि नम्
पि प्रि ये था था यु वा
व्य क्त क्ष्म रि भो ण्ड नम्
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