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कण्ठसक्तमृदुबाहुबन्धनं
न्यस्तपादतलमग्नपादयोः ।
प्रार्थयन्त शयनोत्थितं प्रिया-
स्तं निशात्ययविसर्गचुम्बनम् ॥

अन्वयः AI प्रियाः शयन-उत्थितम् तम् कण्ठ-सक्त-मृदु-बाहु-बन्धनम् न्यस्त-पाद-तल-मग्न-पादयोः निशा-अत्यय-विसर्ग-चुम्बनम् प्रार्थयन्त।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) कण्ठेति॥ प्रियाः शयनादुत्थितं तमग्निवर्णं कण्ठसक्तं कण्ठार्पितं मृदुबाहुबन्धनं यस्मिंस्तत्। अग्रपादयोः स्वकीययोर्न्यस्ते पादतले यस्मिंस्तत्। निशात्यये विसर्गो विसृज्य गमनं तत्र यञ्चुम्बनं तत्प्रार्थयन्त। दुह्याच्- इत्यादिना द्विकर्मकत्वम्। अत्र गोनर्दीयः-रतावसाने यदि चुम्बनादि प्रयुज्य यायान्मदनोऽस्य वासः इति ॥
Summary AI Having just risen from bed, his beloveds, with their soft arms wrapped around his neck, requested a parting kiss for the end of the night. They did so while pressing the soles of their feet against his feet.
सारांश AI सुबह बिस्तर से उठते समय स्त्रियाँ राजा के गले लगकर और अपने पैर उसके पैरों पर रखकर विदाई के चुंबन की प्रार्थना करती थीं।
पदच्छेदः AI
कण्ठसक्तमृदुबाहुबन्धनम्कण्ठसक्तमृदुबाहुबन्धन (२.१) an embrace with soft arms clinging to the neck
न्यस्तपादतलमग्नपादयोःन्यस्तपादतलमग्नपाद (७.२) on whose feet their soles were placed and pressed
प्रार्थयन्तप्रार्थयन्त (प्र√अर्थ् कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) they requested
शयनोत्थितम्शयनउत्थित (उद्√स्था+क्त, २.१) him who had risen from bed
प्रियाःप्रिया (१.३) the beloveds
तम्तद् (२.१) him
निशात्ययविसर्गचुम्बनम्निशाअत्ययविसर्गचुम्बन (२.१) the parting kiss at the end of the night
छन्दः रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
ण्ठ क्त मृ दु बा हु न्ध नं
न्य स्त पा ग्न पा योः
प्रा र्थ न्त नो त्थि तं प्रि या
स्तं नि शा त्य वि र्ग चु म्ब नम्
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