दर्पणेषु परिभोगदर्शिनी-
र्नर्मपूर्वमनुपृष्ठसंस्थितः ।
छायया स्मितमनोज्ञया वधू-
र्ह्नीनिमीलितमुखीश्चकार सः ॥

अन्वयः AI अनुपृष्ठ-संस्थितः सः नर्म-पूर्वम् दर्पणेषु परिभोग-दर्शिनीः वधूः स्मित-मनोज्ञया छायया ह्री-निमीलित-मुखीः चकार।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) दर्पणेष्विति॥ सोऽग्निवर्णो दर्पणेषु परिभोगदर्शिनीः संभोगचिह्नानि पश्यन्तीर्वधूर्नर्मपूर्व परिहासपूर्वम्। अनुपृष्ठं तासां पृष्ठभागे संस्थितः सन्। स्मितेन मनोज्ञया छायया दर्पणगतेन स्वप्रतिबिम्बेन ह्नीनिमीलितमुखीर्लज्जावनतमुखीश्चकार। तमागतं दृष्ट्वा लज्जिता इत्यर्थः ॥
Summary AI Standing behind them playfully, he, with his own charming, smiling reflection, made the women—who were looking at the marks of lovemaking on their bodies in mirrors—close their faces in modesty.
सारांश AI दर्पण में अपना रूप देख रही स्त्रियों के पीछे खड़े होकर जब राजा ने मुस्कुराते हुए अपनी परछाईं दिखाई, तो वे लज्जा से अपनी आँखें मूँद लीं।
पदच्छेदः AI
दर्पणेषुदर्पण (७.३) in mirrors
परिभोगदर्शिनीःपरिभोग–दर्शिनी (२.३) who were seeing the marks of enjoyment
नर्मपूर्वम्नर्मपूर्व playfully
अनुपृष्ठसंस्थितःअनुपृष्ठसंस्थित (१.१) standing behind
छाययाछाया (३.१) with his reflection
स्मितमनोज्ञयास्मितमनोज्ञ (३.१) charming with a smile
वधूःवधू (२.३) the women
ह्रीनिमीलितमुखीःह्रीनिमीलित–मुखी (२.३) whose faces were closed in modesty
चकारचकार (√कृ कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) he made
सःतद् (१.१) he
छन्दः रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
र्प णे षु रि भो र्शि नी
र्न र्म पू र्व नु पृ ष्ठ सं स्थि तः
छा या स्मि नो ज्ञ या धू
र्ह्नी नि मी लि मु खी श्च का सः
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