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चारु नृत्यविगमे च तन्मुखं
स्वेदभिन्नतिलकं परिश्रमात् ।
प्रेमदत्तवदनानिलः पिब-
न्नत्यजीवदमरालकेश्वरौ ॥

अन्वयः AI नृत्य-विगमे च प्रेम-दत्त-वदन-अनिलः सः परिश्रमात् स्वेद-भिन्न-तिलकम् चारु तत्-मुखम् पिबन् अमरालक-ईश्वरौ अति-अजीवत्।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) चाविति॥ किंच, चारु सुन्दरं नृत्यविगमे लास्यावसाने परिश्रमान्नर्तनऽवासात्स्वेदेन भिन्नतिलकं विशीर्णतिलकं तन्मुखं नर्तकीमुखं प्रेम्णा दत्तवदनानिलः प्रवर्तितमुखमारुतः पिबन्। अमराणामलकायाश्चेश्वराविन्द्रकुबेरौ। अत्यजीवदतिक्रम्याजीवत्। ततोऽप्युत्कृष्टजीवित आसीदित्यर्थः। इन्द्रादेरपि दुर्लभमीदृशं सौभाग्यमिति भावः ॥
Summary AI At the end of the dance, kissing her beautiful face—its tilaka mark disordered by sweat from the exertion—he, who offered the breath of his mouth out of love, surpassed both Indra and Kubera in his bliss.
सारांश AI नृत्य के अंत में स्त्रियों के मुख पर आए पसीने को वह अपने मुख की वायु से सुखाता था, जिससे उसे इंद्र और कुबेर के सुखों से भी अधिक आनंद मिलता था।
पदच्छेदः AI
चारुचारु beautiful
नृत्यविगमेनृत्यविगम (७.१) At the end of the dance
and
तन्मुखम्तद्-मुख (२.१) her face
स्वेदभिन्नतिलकम्स्वेदभिन्नतिलक (२.१) whose tilaka mark was disordered by sweat
परिश्रमात्परिश्रम (५.१) from exertion
प्रेमदत्तवदनानिलःप्रेमदत्तवदनअनिल (१.१) he who offered the breath of his mouth out of love
पिबन्पिबत् (√पा+शतृ, १.१) drinking (kissing)
अत्यजीवत्अत्यजीवत् (अति√जीव् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) surpassed
अमरालकेश्वरौअमराअलकाईश्वर (२.२) the lords of Amaravati (Indra) and Alaka (Kubera)
छन्दः रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
चा रु नृ त्य वि मे न्मु खं
स्वे भि न्न ति कं रि श्र मात्
प्रे त्त ना नि लः पि
न्न त्य जी रा के श्व रौ
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