तेनोरुवीर्येण पिता प्रजायै
कल्पिष्यमाणेन ननन्द यूना ।
सुवृष्टियोगादिव जीवलोकः
सस्येन संपत्तिफलोन्मुखेन ॥
तेनोरुवीर्येण पिता प्रजायै
कल्पिष्यमाणेन ननन्द यूना ।
सुवृष्टियोगादिव जीवलोकः
सस्येन संपत्तिफलोन्मुखेन ॥
कल्पिष्यमाणेन ननन्द यूना ।
सुवृष्टियोगादिव जीवलोकः
सस्येन संपत्तिफलोन्मुखेन ॥
अन्वयः
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पिता तेन उरुवीर्येण प्रजायै कल्पिष्यमाणेन यूना ननन्द, जीवलोकः सुवृष्टियोगात् संपत्तिफलोन्मुखेन सस्येन इव ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
तेनेति॥ उरुवीर्येणातिपराक्रमेण। अत एव प्रजायै लोकरक्षणार्थं कल्पिष्यमाणेन तेन यूना निषधेन पिताऽतिथिः। सुवृष्टियोगात्संपत्तिफलोन्मुखेन पाकोन्मुखेन सस्येन जीवलोक इव। ननन्द जहर्ष ॥
Summary
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The father (Atithi) rejoiced in that youth (Nishadha) of great prowess, who was being prepared to rule the subjects, just as the world of living beings rejoices in a crop that, due to good rains, is about to yield the fruit of prosperity.
सारांश
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उत्तम वर्षा से होने वाली समृद्ध फसल को देखकर जैसे संसार प्रसन्न होता है, वैसे ही प्रजा की रक्षा में समर्थ युवा पुत्र को पाकर पिता कुश अत्यंत आनंदित हुए।
पदच्छेदः
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| पिता | पितृ (१.१) | the father |
| तेन | तद् (३.१) | by that |
| उरुवीर्येण | उरु–वीर्य (३.१) | by the one with great prowess |
| प्रजायै | प्रजा (४.१) | for the subjects |
| कल्पिष्यमाणेन | कल्पिष्यमाण (√कॢप्+णिच्+स्य+शानच्, ३.१) | by the one being prepared |
| यूना | युवन् (३.१) | by the youth |
| ननन्द | ननन्द (√नन्द् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | rejoiced |
| सुवृष्टियोगात् | सु–वृष्टि–योग (५.१) | from the occurrence of good rain |
| इव | इव | like |
| जीवलोकः | जीव–लोक (१.१) | the world of living beings |
| सस्येन | सस्य (३.१) | by the crop |
| संपत्तिफलोन्मुखेन | संपत्ति–फल–उन्मुख (३.१) | which is about to yield the fruit of prosperity |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ते | नो | रु | वी | र्ये | ण | पि | ता | प्र | जा | यै |
| क | ल्पि | ष्य | मा | णे | न | न | न | न्द | यू | ना |
| सु | वृ | ष्टि | यो | गा | दि | व | जी | व | लो | कः |
| स | स्ये | न | सं | प | त्ति | फ | लो | न्मु | खे | न |
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