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तस्मिन्प्रयाते परलोकयात्रां
जेतर्यरीणां तनयं तदीयम् ।
उञ्चैः शिरस्त्वाज्जितपारियात्रं
लक्ष्मीः सिषेवे किल पारियात्रम् ॥

अन्वयः AI अरीणां जेतारि तस्मिन् परलोकयात्रां प्रयाते (सति), लक्ष्मीः उच्चैःशिरस्त्वात् जितपारियात्रं तदीयं तनयं पारियात्रं किल सिषेवे ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) तस्मिन्निति॥ अरीणां जेतरि तस्मिन्नहीनगौ परलोकयात्रां प्रयाते प्राप्ते सति। उच्चैः शिरस्त्वादुन्नतशिरस्कत्वाज्जितः पारियात्रः कुलशैलविशेषो येन तं पारियात्रं पारेयात्राख्यं तदीयं तनयं लक्ष्मी राज्यलक्ष्मीः सिषेवे किल ॥
Summary AI When that conqueror of enemies, Ahinagu, departed on his journey to the other world, Fortune (Lakshmi) indeed served his son, named Pariyatra, who, due to his eminence, surpassed even the Pariyatra mountain.
सारांश AI शत्रुओं के विजेता अहीनगु के स्वर्ग सिधारने पर, लक्ष्मी ने उनके पुत्र पारियात्र की सेवा की, जो अपने उच्च व्यक्तित्व के कारण पारियात्र पर्वत से भी अधिक गौरवशाली थे।
पदच्छेदः AI
तस्मिन्तद् (७.१) when he (Ahinagu)
प्रयातेप्रयात (प्र√या+क्त, ७.१) had departed on
परलोकयात्राम्परलोकयात्रा (२.१) the journey to the other world
जेतरिजेतृ (७.१) the conqueror
अरीणाम्अरि (६.३) of enemies
तनयम्तनय (२.१) the son
तदीयम्तदीय (२.१) his
उच्चैःशिरस्त्वात्उच्चैःशिरस्त्व (५.१) due to his eminence
जितपारियात्रम्जितपारियात्र (२.१) who had surpassed the Pariyatra mountain
लक्ष्मीःलक्ष्मी (१.१) Fortune (Lakshmi)
सिषेवेसिषेवे (√सेव् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) served
किलकिल indeed
पारियात्रम्पारियात्र (२.१) Pariyatra (by name)
छन्दः इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
स्मि न्प्र या ते लो या त्रां
जे र्य री णां यं दी यम्
ञ्चैः शि स्त्वा ज्जि पा रि या त्रं
क्ष्मीः सि षे वे कि पा रि या त्रम्
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