वशी सुतस्तस्य वशंवदत्वा-
त्स्वेषामिवासीद्द्विषतामपीष्टः ।
सकृद्विविग्नानपि हि प्रयुक्तं
माधुर्यमीष्टे हरिणान्ग्रहीतुम् ॥
वशी सुतस्तस्य वशंवदत्वा-
त्स्वेषामिवासीद्द्विषतामपीष्टः ।
सकृद्विविग्नानपि हि प्रयुक्तं
माधुर्यमीष्टे हरिणान्ग्रहीतुम् ॥
त्स्वेषामिवासीद्द्विषतामपीष्टः ।
सकृद्विविग्नानपि हि प्रयुक्तं
माधुर्यमीष्टे हरिणान्ग्रहीतुम् ॥
अन्वयः
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तस्य वशी सुतः वशंवदत्वात् स्वेषाम् इव द्विषताम् अपि इष्टः आसीत् । हि प्रयुक्तं माधुर्यं सकृत् विविग्नान् हरिणान् अपि ग्रहीतुम् ईष्टे ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
वशीति॥ तस्य देवानीकस्य वशी समर्थः सुतोऽहीनगुर्नामेति वक्ष्यमाणनामकः। वशं वशकरं मधुरं वदतीति वशंवदः।
प्रियवशे वदः स्वच् (अष्टाध्यायी ३.२.३८ ) इति खच्प्रत्ययः। तस्य भावस्तत्त्वम्। तस्मादिष्टवादित्वात्स्वेषामिव द्विषतामपीष्टः प्रिय आसीत्। अर्थादेवानीकनिर्धारणं लभ्यते। तथा हि-प्रयुक्तमुञ्चारितं माधुर्यं सकृदेकवारं विविग्नान् भीतानपि हरिणान्ग्रहीतुं वशीकर्तुमीष्टे शक्नोति ॥
Summary
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His self-controlled son (Devanika), due to his agreeable nature, was dear even to his enemies, just as he was to his own people. Indeed, gentleness, when employed, is able to win over even deer that have been startled once.
सारांश
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देवानीक का पुत्र अहीनगु अपनी इंद्रियों का विजेता और स्वभाव की मधुरता के कारण शत्रुओं का भी प्रिय था, क्योंकि मधुरता से तो डरे हुए हिरणों को भी वश में किया जा सकता है।
पदच्छेदः
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| वशी | वशिन् (१.१) | self-controlled |
| सुतः | सुत (१.१) | the son (Devanika) |
| तस्य | तद् (६.१) | his |
| वशंवदत्वात् | वशंवदत्व (५.१) | due to his agreeableness |
| स्वेषाम् | स्व (६.३) | of his own people |
| इव | इव | like |
| आसीत् | आसीत् (√अस् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | was |
| द्विषताम् | द्विषत् (६.३) | of his enemies |
| अपि | अपि | even |
| इष्टः | इष्ट (√इष्+क्त, १.१) | dear |
| सकृत् | सकृत् | once |
| विविग्नान् | विविग्न (वि√विज्+क्त, २.३) | startled |
| अपि | अपि | even |
| हि | हि | for |
| प्रयुक्तम् | प्रयुक्त (प्र√युज्+क्त, १.१) | employed |
| माधुर्यम् | माधुर्य (१.१) | gentleness |
| ईष्टे | ईष्टे (√ईश् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is able |
| हरिणान् | हरिण (२.३) | deer |
| ग्रहीतुम् | ग्रहीतुम् (√ग्रह्+तुमुन्) | to win over |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| व | शी | सु | त | स्त | स्य | व | शं | व | द | त्वा |
| त्स्वे | षा | मि | वा | सी | द्द्वि | ष | ता | म | पी | ष्टः |
| स | कृ | द्वि | वि | ग्ना | न | पि | हि | प्र | यु | क्तं |
| मा | धु | र्य | मी | ष्टे | ह | रि | णा | न्ग्र | ही | तुम् |
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