अन्वयः
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सः विघ्नेभ्यः तपः तस्करेभ्यः च सम्पदः रक्षन्, आश्रमैः वर्णैः अपि यथास्वम् षडंशभाक् (आत्मानम्) चक्रे ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
तप इति॥ विघ्नेभ्यस्तपो रक्षन्। तस्करेभ्यः संपदश्च रक्षन्। स राजा। आश्रमैर्ब्रह्मचर्यादिभिर्वर्णैरपि ब्राह्मणादिभिश्च यथास्वं स्वमनतिक्रम्य षडंशभाक् चक्रे। यथाक्रममाश्रमैस्तपसो वर्णैः संपदां च षष्ठांशभाक्कृत इत्यर्थः । षष्ठोंऽशः षडंशः।
संख्या शब्दस्य वृत्तिविषये पूरणार्थत्वमुक्तं प्राक् ॥
Summary
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Protecting the ascetics' austerities from disturbances and the people's wealth from thieves, King Atithi duly received his one-sixth share of their respective merits and produce from all the social classes (Varnas) and stages of life (Ashramas).
सारांश
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तपस्वियों के तप की विघ्नों से और प्रजा की संपत्ति की चोरों से रक्षा करते हुए वे राजा सभी वर्णों और आश्रमों से कर के रूप में उपज का छठा भाग प्राप्त करते थे।
पदच्छेदः
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| तपः | तपस् (२.१) | austerity |
| रक्षन् | रक्षत् (√रक्ष्+शतृ, १.१) | protecting |
| सः | तद् (१.१) | he |
| विघ्नेभ्यः | विघ्न (५.३) | from obstacles |
| तस्करेभ्यः | तस्कर (५.३) | from thieves |
| च | च | and |
| सम्पदः | सम्पद् (२.३) | wealth |
| यथास्वम् | यथास्वम् | according to their respective shares |
| आश्रमैः | आश्रम (३.३) | from the Ashramas |
| चक्रे | चक्रे (√कृ कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | took for himself |
| वर्णैः | वर्ण (३.३) | from the Varnas |
| अपि | अपि | also |
| षडंशभाक् | षड्–अंश–षडंशभाज् (१.१) | a sharer of the sixth part |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | पो | र | क्ष | न्स | वि | घ्ने | भ्य |
| स्त | स्क | रे | भ्य | श्च | सं | प | दः |
| य | था | स्व | मा | श्र | मै | श्च | क्रे |
| व | र्णै | र | पि | ष | डं | श | भाक् |
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