अन्वयः
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पित्रा नित्यम् संवर्धितः, कृतास्त्रः सांपरायिकः दण्डः दण्डवतः तस्य स्व-देहात् न वि-अशिष्यत ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
पित्रेति॥ दण्डो दमः सैन्यं वा, तद्वतो दण्डवतो दण्डसंपन्नस्य तस्य राज्ञः पित्राकुशेन नित्यं संवर्धितः पुष्टः कृतास्त्रः शिक्षितास्त्रः। संपरायो युद्धम्।
युद्धायत्योः संपरायः इत्यमरः (अमरकोशः ३.३.१५९ ) । तमर्हतीति सांपराथिकः। तदर्हति (अष्टाध्यायी ५.१.६३ ) इति ठक्प्रत्ययः। दण्डः सैन्यम्। दण्डो यमे मानमेदे लगुडे दमसैन्ययोः इति विश्वः। स्वदेहान्न व्यशिष्यत नाभिद्यत। स्वदेहेऽपि विशेषणानि योज्यानि। मूनबलं स्वदेहमिवारक्षदित्यर्थः ॥
Summary
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His army, constantly augmented by his father, well-trained in arms and fit for war, was not considered different from his own body by him, the wielder of the rod of justice.
सारांश
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पिता द्वारा पालित और युद्धकला में निपुण वे राजा न्याय के दंड को धारण करने वाले थे। उनकी सेना और न्याय व्यवस्था उनके अपने शरीर के अंगों के समान ही उनके अधीन और अभिन्न थी।
पदच्छेदः
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| पित्रा | पितृ (३.१) | by his father |
| संवर्धितः | संवर्धित (सम्√वृध्+णिच्+क्त, १.१) | nurtured |
| नित्यम् | नित्यम् | always |
| कृतास्त्रः | कृत–अस्त्र (१.१) | trained in arms |
| सांपरायिकः | सांपरायिक (१.१) | fit for war |
| तस्य | तत् (६.१) | of him |
| दण्डवतः | दण्डवत् (६.१) | the wielder of the sceptre |
| दण्डः | दण्ड (१.१) | the army |
| स्वदेहात् | स्व–देह (५.१) | from his own body |
| न | न | not |
| व्यशिष्यत | व्यशिष्यत (वि√शिष् भावकर्मणोः लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was distinguished |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पि | त्रा | सं | व | र्धि | तो | नि | त्यं |
| कृ | ता | स्त्रः | सां | प | रा | यि | कः |
| त | स्य | द | ण्ड | व | तो | द | ण्डः |
| स्व | दे | हा | न्न | व्य | शि | ष्य | त |
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