अन्वयः
AI
(सः) कामम् प्रकृति-वैराग्यम् सद्यः शमयितुम् क्षमः (आसीत्) । (किन्तु) यस्य प्रतीकारः कार्यः (भवेत्), सः तत् न एव उदपादयत् ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
काममिति॥ प्रकृतिवैराग्यं प्रजाविरागम्। दैवादुत्पन्नमिति शेषः। सद्यः कामं सम्यक् शमयितुं प्रतिकर्तुं क्षमः शक्तः स राजा यस्य प्रकृतिवैराग्यस्य प्रतीकारः कार्यः कर्तव्यः। अनर्थहेतुत्वादित्यर्थः। तद्वैराग्यं नोदपादयत् । उत्पन्नप्रतीकारादनुत्पादनं वरमिति भावः। अत्र कौटिल्यः-
क्षीणाः प्रकृतयो लोभं लुब्धा यान्ति विरागताम्। विरक्ता यान्त्यमित्रं वा भर्तारं घ्नन्ति वा स्वयम्॥ तस्मात्प्रकृतीनां विरागकारणानि नोत्पादयेदित्यर्थः ॥
Summary
AI
Although he was capable of immediately quelling any disaffection among his subjects, he never caused such a situation for which a remedy would be required.
सारांश
AI
यद्यपि वे प्रजा के असंतोष को तुरंत शांत करने में समर्थ थे, फिर भी उन्होंने कभी ऐसा कोई कारण उत्पन्न ही नहीं होने दिया जिसके प्रतिकार की आवश्यकता पड़े।
पदच्छेदः
AI
| कामम् | कामम् | although |
| प्रकृतिवैराग्यम् | प्रकृति–वैराग्य (२.१) | disaffection of the subjects |
| सद्यः | सद्यस् | immediately |
| शमयितुम् | शमयितुम् (√शम्+णिच्+तुमुन्) | to quell |
| क्षमः | क्षम (१.१) | capable |
| यस्य | यत् (६.१) | of which |
| कार्यः | कार्य (√कृ+ण्यत्, १.१) | to be done |
| प्रतीकारः | प्रतीकार (१.१) | remedy |
| सः | तत् (१.१) | he |
| तत् | तत् (२.१) | that |
| न | न | not |
| एव | एव | at all |
| उदपादयत् | उदपादयत् (उत्√पद् +णिच् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | caused |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| का | मं | प्र | कृ | ति | वै | रा | ग्यं |
| स | द्यः | श | म | यि | तुं | क्ष | मः |
| य | स्य | का | र्यः | प्र | ती | का | रः |
| स | त | न्नै | वो | द | पा | द | यत् |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.