अन्वयः
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स्वभावतः चपला अपि श्रीः, प्रसाद-अभिमुखे तस्मिन्, निकषे हेम-रेखा इव, अनपायिनी आसीत् ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
प्रसादेति॥ स्वभावतश्चपला चञ्चलापि श्रीः प्रसादाभिमुखे तस्मिन्नृपे। निकषे निकषोपले हेमरेखेव अनपायिनी स्थिराऽऽसीत् ॥
Summary
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Although fickle by nature, the royal fortune (Shri), when he was inclined to show favor, became permanent, like a streak of gold on a touchstone.
सारांश
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उनके सदा प्रसन्न रहने के कारण, स्वभाव से चंचल लक्ष्मी भी उनके पास कसौटी पर सोने की रेखा की भाँति स्थिर और अविनाशी होकर रहने लगी।
पदच्छेदः
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| प्रसादाभिमुखे | प्रसाद–अभिमुख (७.१) | when he was inclined to show favor |
| तस्मिन् | तत् (७.१) | in him |
| चपला | चपल (१.१) | fickle |
| अपि | अपि | even though |
| स्वभावतः | स्वभावतः | by nature |
| निकषे | निकष (७.१) | on a touchstone |
| हेमरेखेव | – | like a line of gold |
| श्रीः | श्री (१.१) | fortune |
| आसीत् | आसीत् (√अस् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | was |
| अनपायिनी | अनपायिन् (१.१) | permanent |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | सा | दा | भि | मु | खे | त | स्मिं |
| श्च | प | ला | पि | स्व | भा | व | तः |
| नि | क | षे | हे | म | रे | खे | व |
| श्री | रा | सी | द | न | पा | यि | नी |
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