अन्वयः
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अभिषेकजलाप्लुता वेदिः यावत् न आश्यायते, तावत् एव अस्य दुःसहः प्रतापः वेलान्तम् प्राप।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
यावदिति॥ अभिषेकजलैराप्लुता सिक्ता वेदिरमिषेकवेदिः। यावन्नाश्यायते न शुष्यति। कर्तरि लट्। तावदेवास्य राज्ञो दुःसहः प्रतापो वेलान्तं वेलापर्यन्तं प्राप ॥
Summary
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Before the sacrificial altar, drenched with the waters of his consecration, could even dry, his unbearable prowess had already reached the shores of the ocean.
सारांश
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अभी राज्याभिषेक के जल से भीगी हुई यज्ञवेदी सूखी भी नहीं थी कि राजा का दुःसह प्रताप समुद्र पर्यन्त पूरी पृथ्वी पर फैल गया।
पदच्छेदः
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| यावत् | यावत् | By the time that |
| न | न | not |
| आश्यायते | आश्यायते (आ√श्यै भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | becomes dry |
| वेदिः | वेदि (१.१) | the altar |
| अभिषेकजलाप्लुता | अभिषेकजल–आप्लुता (१.१) | drenched with the water of consecration |
| तावत् | तावत् | by that time |
| एव | एव | indeed |
| अस्य | इदम् (६.१) | his |
| वेलान्तम् | वेला–अन्त (२.१) | the seashore |
| प्रतापः | प्रताप (१.१) | prowess |
| प्राप | प्राप (प्र√आप् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | reached |
| दुःसहः | दुःसह (१.१) | unbearable |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| या | व | न्ना | श्या | य | ते | वे | दि |
| र | भि | षे | क | ज | ला | प्लु | ताः |
| ता | व | दे | वा | स्य | वे | ला | न्तं |
| प्र | ता | पः | प्रा | प | दुः | स | हः |
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