अन्वयः
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अनुजीविनः प्रसन्नमुखरागम् स्मितपूर्वाभिभाषिणम् तम् मूर्तिमन्तम् विश्वासम् अमन्यन्त।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
प्रसन्नेति॥ प्रसन्नो मुखरागो मुखकान्तिर्यस्य तं स्मितपूर्वं यथा तथाऽभिभाषिणमाभाषणशीलं तमतिथिम्। अनुजीविनो मूर्तिमन्तं विग्रहवन्तं विश्वासं विस्रम्भममन्यन्त।
समौ विस्रम्भविश्वासौ इत्यमरः (अमरकोशः २.८.२३ ) ॥
Summary
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His dependents considered him, with his pleasant facial expression and his habit of speaking with a preceding smile, to be Confidence personified.
सारांश
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प्रसन्न मुख वाले और मृदुभाषी उन राजा को उनके सेवक साक्षात् विश्वास का ही शरीरधारी रूप मानने लगे।
पदच्छेदः
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| प्रसन्नमुखरागम् | प्रसन्न–मुखराग (२.१) | him whose facial complexion was pleasant |
| तम् | तद् (२.१) | him |
| स्मितपूर्वाभिभाषिणम् | स्मितपूर्वम्–अभिभाषिन् (अभि√भाष्+णिनि, २.१) | him who spoke preceded by a smile |
| मूर्तिमन्तम् | मूर्तिमान् (२.१) | personified |
| अमन्यन्त | अमन्यन्त (√मन् कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | they considered |
| विश्वासम् | विश्वास (२.१) | confidence |
| अनुजीविनः | अनुजीविन् (१.३) | The dependents |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | स | न्न | मु | ख | रा | गं | तं |
| स्मि | त | पू | र्वा | भि | भा | षि | णम् |
| मू | र्ति | म | न्त | म | म | न्य | न्त |
| वि | श्वा | स | म | नु | जी | वि | नः |
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