अन्वयः
AI
हिरण्मये आदर्शे नेपथ्यदर्शिनः तस्य छाया, सूर्ये उदिते मेरौ कल्पतरोः इव, विरराज।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
नेपथ्येति॥ हिरण्मये सौवर्ण आदर्शे दर्पणे नेपथ्यदर्शिनो वेषं पश्यतस्तस्यातिथेश्छाया प्रतिबिम्बम्। उदिते सूर्ये दर्पणकल्पे मेरौ यः कल्पतरुस्तस्य छायेव। विरराज। तस्य सूर्यसंक्रान्तबिम्बस्य संभवत्
मेरौइत्युक्तम् ॥
Summary
AI
His reflection, as he observed his attire in the golden mirror, shone brightly, just like the wish-fulfilling tree on Mount Meru when the sun has risen.
सारांश
AI
स्वर्ण दर्पण में दिखाई देने वाली राजा की छवि वैसी ही शोभायमान हुई जैसे सूर्योदय के समय सुमेरु पर्वत पर कल्पवृक्ष की छाया सुशोभित होती है।
पदच्छेदः
AI
| नेपथ्यदर्शिनः | नेपथ्य–दर्शिन् (√दृश्+णिनि, ६.१) | of him who was seeing his attire |
| छाया | छाया (१.१) | the reflection |
| तस्य | तद् (६.१) | his |
| आदर्शे | आदर्श (७.१) | in the mirror |
| हिरण्मये | हिरण्मय (७.१) | golden |
| विरराज | विरराज (वि√राज् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | shone brightly |
| उदिते | उदित (उत्√इ+क्त, ७.१) | having risen |
| सूर्ये | सूर्य (७.१) | when the sun |
| मेरौ | मेरु (७.१) | on Mount Meru |
| कल्पतरोः | कल्पतरु (६.१) | of the wish-fulfilling tree |
| इव | इव | like |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ने | प | थ्य | द | र्शि | न | श्छा | या |
| त | स्या | द | र्शे | हि | र | ण्म | ये |
| वि | र | रा | जो | दि | ते | सू | र्ये |
| मे | रौ | क | ल्प | त | रो | रि | व |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.