अन्वयः
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आमुक्ताभरणः स्रग्वी हंसचिह्नदुकूलवान् सः राज्यश्रीवधूवरः अतिशयप्रेक्ष्यः आसीत्।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
आमुक्तेति॥ आमुक्ताभरणः आसञ्जिताभरणः। स्रजोऽस्य सन्तीति स्रग्वी।
अस्मायामेधास्रजो विनिः (अष्टाध्यायी ५.२.१२१ ) इति विनिप्रत्ययः। हंसाश्चिह्नमस्येति हंसचिह्नं यद्दुकूलं तद्वान्। अत्र बहुव्रीहिणैवार्थसिद्धेर्मतुबानर्थक्येऽपि सर्वधनीत्यादिवत् कर्मधारयादपि मत्वर्थीयं प्रत्ययमिच्छन्ति। एवमन्यत्रापि द्रष्टव्यम्। राज्यश्रीरेव वधूर्नवोढा तस्या वरो वोढा। वधूः स्नुषा नवोढा स्त्री वरो जामातृषिङ्गयोः इति विश्वः। सोऽतिथिः। अतिशयेन प्रेक्ष्यो दर्शनीय आसीत् । वरोऽप्येवंविशेषणः ॥
Summary
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Adorned with ornaments, wearing a garland, and clad in silken garments marked with a swan, he, the bridegroom of the bride that is Royal Fortune, was exceedingly handsome to behold.
सारांश
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आभूषणों, पुष्पमाला और हंसों के चिह्न वाले रेशमी वस्त्रों से सुसज्जित वे राजा राज्यलक्ष्मी रूपी वधु के वर के समान अत्यंत दर्शनीय प्रतीत हुए।
पदच्छेदः
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| आमुक्ताभरणः | आमुक्त (आ√मुच्+क्त)–आभरण (१.१) | He who had put on ornaments |
| स्रग्वी | स्रग्विन् (१.१) | wearing a garland |
| हंसचिह्नदुकूलवान् | हंसचिह्न–दुकूल (+वतुप्, १.१) | having silken garments marked with a swan |
| आसीत् | आसीत् (√अस् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | was |
| अतिशयप्रेक्ष्यः | अतिशय–प्रेक्ष्य (प्र√ईक्ष्+ण्यत्, १.१) | exceedingly handsome |
| सः | तद् (१.१) | he |
| राज्यश्रीवधूवरः | राज्यश्री–वधू–वर (१.१) | the bridegroom of the bride that is Royal Fortune |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आ | मु | क्ता | भ | र | णः | स्र | ग्वी |
| हं | स | चि | ह्न | दु | कू | ल | वान् |
| आ | सी | द | ति | श | य | प्रे | क्ष्यः |
| स | रा | ज्य | श्री | व | धू | व | रः |
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