अन्वयः
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ततः मृगनाभिसुगन्धिना चन्दनेन अङ्गरागम् समापय्य, विन्यस्तरोचनम् पत्रम् च चक्रुः।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
चन्दनेनेति॥ किंच, मृगनाभ्या कस्तूरिकया सुगन्धिना चन्दनेन अङ्गरागमङ्गविलेपनं समापय्य समाप्य ततोऽनन्तरं विन्यस्ता रोचना गोरोचना यस्मिंस्तत्पत्रं पत्ररचनं चक्रुः ॥
Summary
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Then, after applying the unguent of sandalwood paste fragrant with musk, they also created decorative patterns on his body using yellow pigment.
सारांश
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कस्तूरी युक्त चन्दन से अङ्गराग का लेप करने के बाद, उन्होंने राजा के मुख पर गोरोचन से तिलक और पत्रावली की रचना की।
पदच्छेदः
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| चन्दनेन | चन्दन (३.१) | with sandalwood paste |
| अङ्गरागम् | अङ्ग–राग (२.१) | the body-unguent |
| च | च | and |
| मृगनाभिसुगन्धिना | मृगनाभि–सुगन्धि (३.१) | fragrant with musk |
| समापय्य | समापय्य (सम्√आप्+णिच्+ल्यप्) | having applied |
| ततः | ततः | then |
| चक्रुः | चक्रुः (√कृ कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | they made |
| पत्रम् | पत्र (२.१) | decorative patterns |
| विन्यस्तरोचनम् | विन्यस्त (वि+नि√अस्+क्त)–रोचना (२.१) | in which yellow pigment was placed |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| च | न्द | ने | ना | ङ्ग | रा | गं | च |
| मृ | ग | ना | भि | सु | ग | न्धि | ना |
| स | मा | प | य्य | त | त | श्च | क्रुः |
| प | त्रं | वि | न्य | स्त | रो | च | नम् |
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