तस्याः स्पृष्टे मनुजपतिना साहचर्याय हस्ते
माङ्गल्योर्णावलयिनि पुरः पावकस्योच्छिखस्य ।
दिव्यस्तूर्यध्वनिरुदचरद्व्यश्नुवानो दिग-
न्ता न्ग्धोदग्रं तदनु ववृषुः पुष्पमाश्चर्यमेघाः ॥
तस्याः स्पृष्टे मनुजपतिना साहचर्याय हस्ते
माङ्गल्योर्णावलयिनि पुरः पावकस्योच्छिखस्य ।
दिव्यस्तूर्यध्वनिरुदचरद्व्यश्नुवानो दिग-
न्ता न्ग्धोदग्रं तदनु ववृषुः पुष्पमाश्चर्यमेघाः ॥
माङ्गल्योर्णावलयिनि पुरः पावकस्योच्छिखस्य ।
दिव्यस्तूर्यध्वनिरुदचरद्व्यश्नुवानो दिग-
न्ता न्ग्धोदग्रं तदनु ववृषुः पुष्पमाश्चर्यमेघाः ॥
अन्वयः
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पुरः उच्छिखस्य पावकस्य, साहचर्याय मनुज-पतिना तस्याः माङ्गल्य-ऊर्णा-वलयिनि हस्ते स्पृष्टे (सति), दिगन्तान् व्यश्नुवानः दिव्यः तूर्य-ध्वनिः उदचरत् । तत् अनु आश्चर्य-मेघाः स्निग्ध-उदग्रम् पुष्पम् ववृषुः ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
तस्या इति॥ मनुजपतिना कुशेन साहचर्याय। सहधर्माचरणायेत्यर्थः। माङ्गल्या मङ्गले साधुर्या ऊर्णा मेषादिलोम।
ऊर्णा मेषादिलोम्नि स्यात् इत्यमरः (अमरकोशः ३.३.५६ ) । अत्र लक्षणया तन्निर्मितं सूत्रमुच्यते। तया वलयिनि वलयवति तस्याः कुमुद्वत्या हस्ते पाणावुच्छिखस्योदर्चिषः पावकस्य पुरोऽग्रे स्पृष्टे गृहीते सति दिगन्तान् व्यश्नुवानो व्याप्नुवन्। दिव्यस्तूर्यध्वनिरुदचरदुत्थितः। तदन्वाश्चर्या अद्भुता मेघा गन्धेनोदग्रमुत्कटं पुष्पं पुष्पाणि। जात्यभिप्रायेणैकवचनम्। ववृषुः। आश्चर्य शब्दस्य रौद्रं तूग्रममी त्रिषु। चतुर्दश इत्यमरवचनात्त्रिलिङ्गत्वम् ॥
Summary
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As the king took her hand, adorned with the auspicious woolen thread, for the marriage ceremony before the leaping sacred fire, a divine music arose, pervading all directions. After that, wondrous clouds rained down flowers in a pleasing and grand manner.
सारांश
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प्रज्वलित अग्नि के समक्ष जब राजा कुश ने कुमुद्वती के मांगलिक कंगन वाले हाथ को थामा, तब दिशाओं में दिव्य दुंदुभियाँ बज उठीं और आश्चर्यजनक मेघों ने सुगंधित पुष्पों की वर्षा की।
पदच्छेदः
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| तस्याः | तत् (६.१) | her |
| स्पृष्टे | being touched | |
| मनुजपतिना | मनुज–पति (३.१) | by the king of men |
| साहचर्याय | साहचर्य (४.१) | for companionship |
| हस्ते | हस्त (७.१) | hand |
| माङ्गल्योर्णावलयिनि | माङ्गल्य–ऊर्णा–वलयिन् (७.१) | adorned with the auspicious woolen thread |
| पुरः | पुरस् | in front of |
| पावकस्य | पावक (६.१) | of the fire |
| उच्छिखस्य | उद्–शिख (६.१) | with leaping flames |
| दिव्यः | दिव्य (१.१) | divine |
| तूर्यध्वनिः | तूर्य–ध्वनि (१.१) | sound of musical instruments |
| उदचरत् | उदचरत् (उद्√चर् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | arose |
| व्यश्नुवानः | pervading | |
| दिगन्तान् | दिगन्त (२.३) | the quarters of the sky |
| स्निग्धोदग्रम् | स्निग्ध–उदग्रम् | pleasantly and loudly |
| तदनु | तत्–अनु | after that |
| ववृषुः | ववृषुः (√वृष् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | rained |
| पुष्पम् | पुष्प (२.१) | flowers |
| आश्चर्यमेघाः | आश्चर्य–मेघ (१.३) | wonder-clouds |
छन्दः
मन्दाक्रान्ता [१७: मभनततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | स्याः | स्पृ | ष्टे | म | नु | ज | प | ति | ना | सा | ह | च | र्या | य | ह | स्ते |
| मा | ङ्ग | ल्यो | र्णा | व | ल | यि | नि | पु | रः | पा | व | क | स्यो | च्छि | ख | स्य |
| दि | व्य | स्तू | र्य | ध्व | नि | रु | द | च | र | द्व्य | श्नु | वा | नो | दि | ग | |
| न्ता | न्ग्धो | द | ग्रं | त | द | नु | व | वृ | षुः | पु | ष्प | मा | श्च | र्य | मे | घाः |
| म | भ | न | त | त | ग | ग | ||||||||||
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