इत्यूचिवानुपहृताभरणः क्षितीशं
श्लाघ्यो भवान्स्वजन इत्यनुभाषितारम् ।
संयोजयां विधिवदास समेतबन्धुः
कन्यामयेन कुमुदः कुलभूषणेन ॥
इत्यूचिवानुपहृताभरणः क्षितीशं
श्लाघ्यो भवान्स्वजन इत्यनुभाषितारम् ।
संयोजयां विधिवदास समेतबन्धुः
कन्यामयेन कुमुदः कुलभूषणेन ॥
श्लाघ्यो भवान्स्वजन इत्यनुभाषितारम् ।
संयोजयां विधिवदास समेतबन्धुः
कन्यामयेन कुमुदः कुलभूषणेन ॥
अन्वयः
AI
उपहृत-आभरणः कुमुदः "भवान् श्लाघ्यः स्वजनः" इति अनुभाषितारम् क्षितीशम् इति ऊचिवान् । (ततः) समेत-बन्धुः (सन्) कन्याम् कुल-भूषणेन अयेन विधिवत् संयोजयामास ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
इतीति॥ इति पूर्वश्लोकोक्तम्। ऊचिवानुक्तवान्। ब्रुवः क्वसुः। उपहृताभरणः प्रत्यर्पिताभरणः कुमुदः। हे कुमुद! भवाञ्श्लाघ्यः स्वजनो बन्धुः। इत्यनुभाषितारमनुवक्तारं क्षितीशं कुशं समेतबन्धुर्युक्तबन्धुः सन् कन्यामयेन कन्यारूपेण कुलयोर्भूषणेन विधिवत्संयोजयामास। न केवलं तदीयमेव किंतु स्वकीयमपि भूषणं तस्मै दत्तवानिति ध्वनिः। आम्प्रत्ययानुप्रयोगयोर्व्यवधानं तु प्रागेव समाहितम् ॥
Summary
AI
Having thus spoken to the king—who had presented the ornament and replied, "You are a praiseworthy kinsman"—Kumuda, with his relatives gathered, duly united his daughter in marriage with Kusha, the ornament of his dynasty.
सारांश
AI
आभूषण लौटाने के बाद जब राजा ने कुमुद को अपना श्रेष्ठ संबंधी स्वीकार किया, तब नागराज कुमुद ने अपने परिजनों के साथ मिलकर कुल की शोभा बढ़ाने वाली अपनी बहन का विवाह विधिपूर्वक कुश के साथ कर दिया।
पदच्छेदः
AI
| इति | इति | thus |
| ऊचिवान् | having spoken | |
| उपहृताभरणः | उपहृत (उप√हृ+क्त)–आभरण (१.१) | who had presented the ornament |
| क्षितीशम् | क्षितीश (२.१) | to the king |
| श्लाघ्यः | praiseworthy | |
| भवान् | भवत् (१.१) | you |
| स्वजनः | स्वजन (१.१) | a kinsman |
| इति | इति | thus |
| अनुभाषितारम् | to him who replied | |
| संयोजयामास | संयोजयामास (सम्√युज् +णिच् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | he united in marriage |
| विधिवत् | विधिवत् | according to rites |
| समेतबन्धुः | समेत (सम्√इ+क्त)–बन्धु (१.१) | with his relatives gathered |
| कन्याम् | कन्या (२.१) | the maiden |
| अयेन | इदम् (३.१) | with this one |
| कुमुदः | कुमुद (१.१) | Kumuda |
| कुलभूषणेन | कुल–भूषण (३.१) | the ornament of his dynasty |
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | त्यू | चि | वा | नु | प | हृ | ता | भ | र | णः | क्षि | ती | शं |
| श्ला | घ्यो | भ | वा | न्स्व | ज | न | इ | त्य | नु | भा | षि | ता | रम् |
| सं | यो | ज | यां | वि | धि | व | दा | स | स | मे | त | ब | न्धुः |
| क | न्या | म | ये | न | कु | मु | दः | कु | ल | भू | ष | णे | न |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.