स्नात्वा यथाकाममसौ सदार-
स्तीरोपकार्यां गतमात्र एव ।
दिव्येन शून्यं वलयेन बाहु-
मपोढनेपथ्यविधिर्ददर्श ॥

अन्वयः AI सदारः असौ यथाकामम् स्नात्वा तीर-उपकार्याम् गतमात्रः एव, अपोढ-नेपथ्य-विधिः (सन्) दिव्येन वलयेन शून्यम् बाहुम् ददर्श ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) स्नात्वेति॥ असौ कुशः सदारः सन् यथाकामं यथेच्छं स्नात्वा विगाह्य। `तीरे या उपकार्या पूर्वोक्ता तां गतमात्रो गगत एवापोढनेपथ्यविधिरकृतप्रसाधन एव दिव्येन वलयेन शून्यं बाहुं ददर्श ॥
Summary AI Having bathed to his heart's content with his wives, just as he reached the tent on the riverbank and was changing his attire, King Kusha noticed his arm was bare, missing the divine bracelet.
सारांश AI इच्छानुसार स्नान कर जब राजा तट पर बने शिविर में पहुंचे, तो गीले वस्त्र उतारते समय उन्होंने देखा कि उनकी भुजा उस दिव्य कंगन से रहित हो गई है।
पदच्छेदः AI
स्नात्वा having bathed
यथाकामम्यथाकामम् as he pleased
असौअदस् (१.१) he
सदारःदार (१.१) with his wives
तीरोपकार्याम्तीरउपकार्या (२.१) to the tent on the bank
गतमात्रःगत (√गत+क्त)मात्र (१.१) just as he went
एवएव just
दिव्येनदिव्य (३.१) divine
शून्यम्शून्य (२.१) empty
वलयेनवलय (३.१) of the bracelet
बाहुम्बाहु (२.१) arm
अपोढनेपथ्यविधिःअपोढ (अप√ऊह्+क्त)नेपथ्यविधि (१.१) he who had completed the act of changing clothes
ददर्शददर्श (√दृश् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) saw
छन्दः उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
स्ना त्वा था का सौ दा
स्ती रो का र्यां मा त्र
दि व्ये शू न्यं ये बा हु
पो ने थ्य वि धि र्द र्श
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