पश्यावरोधैः शतशो मदीयै-
र्विगाह्यमानो गलिताङ्गरागैः ।
संध्योदयः साभ्र इवैष वर्णं
पुष्यत्यनेकं सरयूप्रवाहः ॥
पश्यावरोधैः शतशो मदीयै-
र्विगाह्यमानो गलिताङ्गरागैः ।
संध्योदयः साभ्र इवैष वर्णं
पुष्यत्यनेकं सरयूप्रवाहः ॥
र्विगाह्यमानो गलिताङ्गरागैः ।
संध्योदयः साभ्र इवैष वर्णं
पुष्यत्यनेकं सरयूप्रवाहः ॥
अन्वयः
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पश्य, एषः सरयू-प्रवाहः मदीयैः गलित-अङ्ग-रागैः शतशः अवरोधैः विगाह्यमानः (सन्) स-अभ्रः सन्ध्या-उदयः इव अनेकम् वर्णम् पुष्यति ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
पश्येति॥ गलिताङ्गरागैर्मदीयैः शतशोऽवरोधैर्विगाह्यमानो विलोङ्यमान एष सरयूप्रवाहः। साभ्रः समेघः संध्योदयः संध्याविर्भाव इव। अनेकं नानाविधं वर्णं रक्तपीतादिकं पुष्यति पश्य। वाक्यार्थः कर्म ॥
Summary
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"Look! As hundreds of my harem women, their body-paints washing off, enter this current of the Sarayu, it acquires various colors, just like the sky at twilight filled with clouds."
सारांश
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देखो, रानियों के बहते हुए अंगराग के कारण सरयू का जल संध्याकाल के बादलों से घिरे रंग-बिरंगे आकाश की भाँति प्रतीत हो रहा है।
पदच्छेदः
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| पश्य | पश्य (√दृश् कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | Look! |
| अवरोधैः | अवरोध (३.३) | by the harem women |
| शतशः | शतशस् | by the hundreds |
| मदीयैः | मदीय (३.३) | my |
| विगाह्यमानः | विगाह्यमान (वि√गाह्+शानच्, १.१) | being entered |
| गलित-अङ्ग-रागैः | गलित–अङ्ग–राग (३.३) | by those whose body-paints have washed off |
| सन्ध्या-उदयः | सन्ध्या–उदय (१.१) | the twilight glow |
| स-अभ्रः | स–अभ्र (१.१) | with clouds |
| इव | इव | like |
| एषः | एतद् (१.१) | this |
| वर्णम् | वर्ण (२.१) | color |
| पुष्यति | पुष्यति (√पुष् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | acquires |
| अनेकम् | अनेक (२.१) | many a |
| सरयू-प्रवाहः | सरयू–प्रवाह (१.१) | the current of the Sarayu |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प | श्या | व | रो | धैः | श | त | शो | म | दी | यै |
| र्वि | गा | ह्य | मा | नो | ग | लि | ता | ङ्ग | रा | गैः |
| सं | ध्यो | द | यः | सा | भ्र | इ | वै | ष | व | र्णं |
| पु | ष्य | त्य | ने | कं | स | र | यू | प्र | वा | हः |
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