अन्वयः
AI
निदाघ-अवधिना मनोज्ञ-गन्धम् सहकार-भङ्गम्, पुराण-शीधुम्, नव-पाटलम् च संबध्नता कामि-जनेषु सर्वे दोषाः प्रमृष्टाः ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
मनोज्ञेति॥ मनोज्ञगन्धमिति सर्वत्र संबध्यते। सहकारभङ्गं चूतपल्लवखण्डम्। पुराणं वासितं शेरतेऽनेनेति शीधुः पक्वेक्षुरसप्रकृतिकः सुराविशेषस्तम्।
शीङोधुक्(उ.सू.४७८) इत्यणादिसूत्रेण शीङ् स्वप्ने इत्यस्माद्धातोर्धुक्प्रत्ययः। पक्वैरिक्षुरसैरस्त्री शीधुः पक्वरसः शिवः इति यादवः। नवं पाटलायाः पुष्पं पाटलं च संबध्नता संघट्टयता निदाघावधिना ग्रीष्मकालेन। अवधिस्त्ववधाने स्यात्सीम्नि काले बिलेऽपि च इति विश्वः। कामिजनेषु विषये सर्वे दोषास्तापादयः प्रमृष्टाः परिहृताः ॥
Summary
AI
By the summer season, which brought together fragrant mango sprouts, aged rum, and fresh Patala flowers, all the faults (of separation) in lovers were wiped away.
सारांश
AI
आम की मंजरी, पुरानी मदिरा और ताजे पाटल के फूलों की सुगंध ने प्रेमियों के लिए ग्रीष्म ऋतु के सभी दोषों और कष्टों को मिटा दिया।
पदच्छेदः
AI
| मनोज्ञ-गन्धम् | मनस्–ज्ञ–गन्ध (२.१) | the one with a pleasant fragrance |
| सहकार-भङ्गम् | सहकार–भङ्ग (२.१) | the mango sprout |
| पुराण-शीधुम् | पुराण–शीधु (२.१) | old rum |
| नव-पाटलम् | नव–पाटल (२.१) | the fresh Patala flower |
| च | च | and |
| संबध्नता | सम्बध्नत् (सम्√बन्ध्+शतृ, ३.१) | by the one connecting |
| कामि-जनेषु | कामिन्–जन (७.३) | in lovers |
| दोषाः | दोष (१.३) | the faults |
| सर्वे | सर्व (१.३) | all |
| निदाघ-अवधिना | निदाघ–अवधि (३.१) | by the summer season |
| प्रमृष्टाः | प्रमृष्ट (प्र√मृज्+क्त, १.३) | were wiped away |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| म | नो | ज्ञ | ग | न्धं | स | ह | का | र | भ | ङ्गं |
| पु | रा | ण | शी | धुं | न | व | पा | ट | लं | च |
| सं | ब | ध्न | ता | का | मि | ज | ने | षु | दो | षाः |
| स | र्वे | नि | दा | घा | व | धि | ना | प्र | मृ | ष्टाः |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.