अन्वयः
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स्थिरधीः सः (रामः) सानुजः अग्निपुरःसरः (सन्) पतिवात्सल्यात् गृहवर्जम् अयोधयया अन्वितः (सन्) उदक् प्रतस्थे।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
स इति॥ उदगिति च। युग्मम्। स्थिरधीः स रामः। रिपव एव नागा गजास्तेषामङ्कुशं निवारकं कुशं कुशावत्यां पुर्यां निवेश्य स्थापयित्वा। सूक्तैः समीचीनवचनैः सतां जनिता अश्रुलवा अश्रुलेशा येन तं लवं लवाख्यं पुत्रम्।
लवो लेशे विलासे च छेदने रामनन्दने इति विश्वः। शरावत्यां पुर्याम्। शरादीनां च (अष्टाध्यायी ६.३.१२० ) इति शर-कुश शब्दयोर्दीर्घः। निवेश्य। सानुजोऽग्निपुरःसरः सन्। पत्यौ भर्तरि वात्सल्यादनुरागात्। गृहान् वर्जयित्वा गृहवर्जम्। द्वितीयायां च (अष्टाध्यायी ३.४.५३ ) इति णमुल्। अयं क्वचिदपरीप्सायामपीष्यते अनुदात्तं पदमेकवर्जम् (अष्टाध्यायी ६.१.१५८ ) इत्येकाचः शेषतया व्याख्यातत्वात्। परीप्सा त्वरा। अयोध्ययान्वितोऽनुगत उदक्प्रतस्थे ॥
Summary
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With firm resolve, Rama, accompanied by his younger brothers and preceded by the sacred fire, set out northwards. He was followed by the people of Ayodhya—everything except the physical houses—out of their deep affection for their lord.
सारांश
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दृढ़बुद्धि राम अपने भाइयों और अग्निहोत्र के साथ उत्तर की ओर चल दिए, और उनके पीछे विरह-कातर अयोध्यावासी भी चल पड़े।
पदच्छेदः
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| उदक् | उदच् | northwards |
| प्रतस्थे | प्रतस्थे (प्र√स्था कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | set out |
| स्थिरधीः | स्थिर–धी (१.१) | of firm resolve |
| सानुजः | स–अनुज (१.१) | with his younger brothers |
| अग्निपुरःसरः | अग्नि–पुरःसर (१.१) | with the sacred fire preceding him |
| अन्वितः | अन्वित (अनु√इ+क्त, १.१) | followed by |
| पतिवात्सल्यात् | पति–वात्सल्य (५.१) | due to affection for their lord |
| गृहवर्जम् | गृह–वर्जम् | except for the houses |
| अयोधयया | अयोध्या (३.१) | by Ayodhya (its people) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| उ | द | क्प्र | त | स्थे | स्थि | र | धीः |
| सा | नु | जो | ऽग्नि | पु | रः | स | रः |
| अ | न्वि | तः | प | ति | वा | त्स | ल्या |
| द्गृ | ह | व | र्ज | म | यो | ध्य | या |
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