अन्वयः
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अथ मुनिवेषः कालः उपेत्य राघवम् प्र उवाच - यः रहःसंवादिनौ आवाम् पश्येत्, तम् त्यजेः इति ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
उपत्यिति॥ अथ कालोऽन्तको मुनिवेषः सन्नुपेत्य राघवं प्रोवाच। किमित्याह-रहस्येकान्ते संवादिनौ संभाषिणावावां यः पश्येत्। रहस्यभङ्गं कुर्यादित्यर्थः। तं त्यजेरिति ॥
Summary
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Then Time, in the guise of a sage, approached Raghava (Rama) and said, "Whoever sees us two conversing in private, you must abandon him."
सारांश
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मुनि का वेश धारण कर आए काल ने राम से एकांत में कहा कि जो भी हमारी बातचीत को देखेगा, आपको उसका त्याग करना होगा।
पदच्छेदः
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| उपेत्य | उपेत्य (उप√इ+ल्यप्) | having approached |
| मुनिवेषः | मुनि–वेष (१.१) | in the guise of a sage |
| अथ | अथ | then |
| कालः | काल (१.१) | Time |
| प्र-उवाच | प्रोवाच (प्र√वच् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | said |
| राघवम् | राघव (२.१) | to Raghava |
| रहःसंवादिनौ | रहस्–संवादिन् (२.२) | us two conversing in private |
| पश्येत् | पश्येत् (√दृश् कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | should see |
| आवाम् | अस्मद् (२.२) | us two |
| यः | यद् (१.१) | whoever |
| तम् | तद् (२.१) | him |
| त्यजेः | त्यजेः (√त्यज् कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you must abandon |
| इति | इति | thus |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| उ | पे | त्य | मु | नि | वे | षो | ऽथ |
| का | लः | प्रो | वा | च | रा | घ | वम् |
| र | हः | सं | वा | दि | नौ | प | श्ये |
| दा | वां | य | स्तं | त्य | जे | रि | ति |
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