अन्वयः
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देवि विश्वंभरे! यथा मे पत्यौ वाक् मनः कर्मभिः व्यभिचारः न (अस्ति), तथा माम् अन्तर्धातुम् अर्हसि ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
वाङ्मन इति॥ वाङ्मनःकर्मभिः पत्यौ विषये मे व्यभिचारः स्खालित्यं न यथा नास्ति यदि तथा तर्हि। विश्वं बिभर्तीति विश्वंभरा भूमिः।
संज्ञायां भृतॄ- (अष्टाध्यायी ३.२.४६ ) इत्यादिना खच्प्रत्ययः। अरुर्द्विषत्- (अष्टाध्यायी ६.३.६७ ) इत्यादिना मुमागमः। हे विशअवंभरे देवि! मामन्तर्धातुं गर्भे वासयितुमर्हसि ॥
Summary
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"O Goddess Earth, supporter of the universe! Just as I have never been unfaithful to my husband in thought, word, or deed, so you should please take me within yourself."
सारांश
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यदि मैंने मन, वचन और कर्म से पति के प्रति कभी व्यभिचार नहीं किया है, तो हे पृथ्वी देवी! आप मुझे अपने भीतर समाहित कर लें।
पदच्छेदः
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| वाक्-मनः-कर्मभिः | वाच्–मनस्–कर्मन् (३.३) | by word, mind, and deed |
| पत्यौ | पति (७.१) | towards my husband |
| व्यभिचारः | व्यभिचार (१.१) | infidelity |
| यथा | यथा | as |
| न | न | not |
| मे | अस्मद् (६.१) | of me |
| तथा | तथा | so |
| विश्वंभरे | विश्वंभरा (८.१) | O supporter of the universe |
| देवि | देवी (८.१) | O Goddess |
| माम् | अस्मद् (२.१) | me |
| अन्तर्धातुम् | अन्तर्धातुम् (अन्तर्√धा+तुमुन्) | to conceal |
| अर्हसि | अर्हसि (√अर्ह् कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you should |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वा | ङ्म | न | क | र्म | भिः | प | त्यौ |
| व्य | भि | चा | रो | य | था | न | मे |
| त | था | वि | श्वं | भ | रे | दे | वि |
| मा | म | न्त | र्धा | तु | म | र्ह | सि |
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