अन्वयः
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आस्थितविष्टरः मुनिः भर्तुः दृष्टिविषये ताम् (उवाच) - वत्से! स्ववृत्ते लोकम् निःसंशयम् कुरु, इति अशात् ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
तामिति॥ आस्थितविष्टरोऽधिष्ठितासनो मुनिः। हे वत्से! भर्तुर्दृष्टिविषये समक्षं स्ववृत्ते स्वचरिते विषये लोकं निःसंशयं कुरु। इति तां सीतामशाच्छास्ति स्म ॥
Summary
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The sage, seated on his mat, commanded her, who was in her husband's line of sight: "O child, make the people free from doubt regarding your conduct."
सारांश
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अपने पति के सम्मुख खड़ी सीता को आसन पर बैठे मुनि ने आदेश दिया कि वे अपने चरित्र के विषय में लोक के संशय को दूर करें।
पदच्छेदः
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| ताम् | तद् (२.१) | to her |
| दृष्टिविषये | दृष्टि–विषय (७.१) | in the line of sight |
| भर्तुः | भर्तृ (६.१) | of her husband |
| मुनिः | मुनि (१.१) | the sage |
| आस्थितविष्टरः | आस्थित–विष्टर (१.१) | seated on a mat |
| कुरु | कुरु (√कृ कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | make |
| निःसंशयम् | निःसंशय (२.१) | free from doubt |
| वत्से | वत्सा (८.१) | O child! |
| स्ववृत्ते | स्ववृत्त (७.१) | regarding your conduct |
| लोकम् | लोक (२.१) | the people |
| इति | इति | thus |
| अशात् | अशात् (√शास् कर्तरि लुङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | commanded |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| तां | दृ | ष्टि | वि | ष | ये | भ | र्तु |
| र्मु | नि | रा | स्थि | त | वि | ष्ट | रः |
| कु | रु | निः | सं | श | यं | व | त्से |
| स्व | वृ | त्ते | लो | क | मि | त्य | शात् |
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