अन्वयः
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सा काषायपरिवीतेन स्वपदार्पितचक्षुषा शान्तेन वपुषा एव शुद्धा इति अन्वमीयत ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
काषायेति॥ कषायेण रक्तं काषायम्।
तेन रक्तं रागात् (अष्टाध्यायी ४.२.१ ) इत्यण्। तेन परिवीतेन संवृतेन स्वपदार्पितचक्षुषा शान्तेन प्रसन्नेन वपुषैव सा सीता शुद्धा साध्वीत्यन्वमीयतानुमिता ॥
Summary
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She (Sita) was inferred to be pure simply by her tranquil form, which was clad in ochre robes and had its gaze fixed on her own feet.
सारांश
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गेरुआ वस्त्र पहने और दृष्टि नीचे झुकाए हुए सीता के शांत स्वरूप से ही उनकी पवित्रता का अनुमान लगाया जा रहा था।
पदच्छेदः
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| काषायपरिवीतेन | काषाय–परिवीत (३.१) | by that which was clad in ochre robes |
| स्वपदार्पितचक्षुषा | स्वपद–अर्पित–चक्षुस् (३.१) | by that whose gaze was fixed on her own feet |
| अन्वमीयत | अन्वमीयत (अनु√मा +यक् भावकर्मणोः लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was inferred |
| शुद्धा | शुद्ध (१.१) | pure |
| इति | इति | that |
| शान्तेन | शान्त (३.१) | by the tranquil |
| वपुषा | वपुस् (३.१) | form |
| एव | एव | itself |
| सा | तद् (१.१) | she |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| का | षा | य | प | रि | वी | ते | न |
| स्व | प | दा | र्पि | त | च | क्षु | षा |
| अ | न्व | मी | य | त | शु | द्धे | ति |
| शा | न्ते | न | व | पु | षै | व | सा |
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