तद्गीतश्रवणैकाग्रा संसदश्रुमुखी बभौ ।
हिमनिष्यन्दिनी प्रातर्निर्वातेव वनस्थली ॥

अन्वयः AI तत्-गीत-श्रवण-एकाग्रा अश्रु-मुखी संसद्, प्रातः निर्-वाता हिम-निष्यन्दिनी वन-स्थली इव, बभौ ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) तदिति॥ तयोर्गीतश्रवण एकाग्राऽऽसक्ता। अश्रुमुखी। आनन्दादिति भावः। संसत् सभा प्रातर्हिमनिष्यन्दिनी निर्वाता वातरहिता वनस्थलीव। बभौ शुशुभे। आनन्दपारवश्यान्निष्पन्दमास्त इत्यर्थः ॥
Summary AI The assembly, intently focused on hearing their song and with tear-filled faces, appeared like a windless forest glade in the morning, shedding drops of dew.
सारांश AI उनके गायन में मग्न वह सभा अश्रुपूरित नेत्रों वाली होकर ऐसी लगी, जैसे ओस की बूंदें गिराती हुई प्रातःकाल की शांत वनस्थली हो।
पदच्छेदः AI
तद्गीतश्रवणैकाग्रातद्गीतश्रवणएकाग्र (१.१) intently focused on hearing their song
संसद्संसद् (१.१) the assembly
अश्रुमुखीअश्रुमुख (१.१) with tear-filled faces
बभौबभौ (√भा कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) appeared
हिमनिष्यन्दिनीहिमनिष्यन्दिन् (१.१) shedding dew
प्रातःप्रातर् in the morning
निर्वातानिर्वात (१.१) windless
इवइव like
वनस्थलीवनस्थली (१.१) a forest glade
छन्दः अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
द्गी श्र णै का ग्रा
सं श्रु मु खी भौ
हि नि ष्य न्दि नी प्रा
र्नि र्वा ते स्थ ली
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