अन्वयः
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प्राक्-वंश-वासिनः अनन्य-जानेः पत्युः वैदेह्याः त्यागः अपि श्लाघ्यः (आसीत्), यस्मात् हिरण्मयी जाया सा एव आसीत् ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
श्लाघ्य इति॥ वैदेह्यास्त्यागोऽपि श्लाघ्यो वर्ण्य एव। कुतः? यस्माद् प्रान्वंशः प्राचीनस्थूणो यज्ञनस्थूणो यज्ञशालाविशेषः। तद्वासिनः। नास्त्यन्या जाया यस्य तस्यानन्यजानेः।
जायाया निङ् (अष्टाध्यायी ५.४.१३४ ) इति समासान्तो निङादेशः। पत्यू रामस्य हिरण्मयी सौवर्णी। दाण्डिनायन- (अष्टाध्यायी ६.४.१७४ ) आदिदग्रेण निपातेः। सा निजैव जाया पत्न्यासीत्। कविवाक्यमेतत् ॥
Summary
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Even the abandonment of Sita by her husband, who lived in his ancestral home and had no other wife, was praiseworthy, because his ritual-wife was a golden effigy of her alone.
सारांश
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पूर्व में अयोध्या में रहने वाले और एकपत्नीव्रती राम द्वारा सीता का त्याग प्रशंसनीय था, क्योंकि उन्होंने सीता की अनुपस्थिति में उनकी स्वर्ण प्रतिमा को ही अपनी पत्नी बनाया।
पदच्छेदः
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| श्लाघ्यः | श्लाघ्य (√श्लाघ्+यत्, १.१) | praiseworthy |
| त्यागः | त्याग (√त्यज्+घञ्, १.१) | the abandonment |
| अपि | अपि | even |
| वैदेह्याः | वैदेही (६.१) | of Vaidehi (Sita) |
| पत्युः | पति (६.१) | of the husband |
| प्राग्वंशवासिनः | प्राच्–वंश–वासिन् (६.१) | who was living in his ancestral home |
| अनन्यजानेः | अनन्य–जानि (६.१) | who had no other wife |
| सा | तद् (१.१) | she |
| एव | एव | indeed |
| आसीत् | आसीत् (√अस् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | was |
| यस्मात् | यद् (५.१) | because |
| जाया | जाया (१.१) | wife |
| हिरण्मयी | हिरण्मय (१.१) | golden |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| श्ला | घ्य | स्त्या | गो | ऽपि | वै | दे | ह्याः |
| प | त्युः | प्रा | ग्वं | श | वा | सि | नः |
| अ | न | न्य | जा | नेः | सै | वा | सी |
| द्य | स्मा | ज्जा | या | हि | र | ण्म | यी |
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