अन्वयः
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कुम्भयोनिः तस्मै दिव्य-परिग्रहम् अलंकारं ददौ, यः पीतेन समुद्रेण आत्म-निष्क्रयम् इव दत्तः आसीत् ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
कुम्भेति॥ कुम्भयोनिरगस्त्यः पीतेन समुद्रेणात्मनिष्क्रयमिवात्ममोचनमूल्यमिव दत्तम्। अत एव परिगृह्यत इति व्युत्पत्त्या दिव्यपरिग्रहः। दिव्यानां परिग्राह्य इत्यर्थः। तमलंकारं तस्मै रामाय ददौ ॥
Summary
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Kumbhayoni (Agastya) gave Rama a divine ornament, which seemed as if it had been given by the ocean he had drunk as a ransom for itself.
सारांश
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ऋषि अगस्त्य ने राम को वह दिव्य आभूषण प्रदान किया, जो पूर्व में समुद्र ने उन्हें उपहार स्वरूप दिया था।
पदच्छेदः
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| कुम्भयोनिः | कुम्भयोनि (१.१) | Kumbhayoni (Agastya) |
| अलंकारं | अलंकार (२.१) | an ornament |
| तस्मै | तद् (४.१) | to him (Rama) |
| दिव्यपरिग्रहम् | दिव्य–परिग्रह (२.१) | a divine ornament |
| ददौ | ददौ (√दा कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | gave |
| दत्तं | दत्त (√दा+क्त, २.१) | given |
| समुद्रेण | समुद्र (३.१) | by the ocean |
| पीतेन | पीत (√पा+क्त, ३.१) | which was drunk |
| इव | इव | as if |
| आत्मनिष्क्रयम् | आत्मन्–निष्क्रय (२.१) | as a ransom for itself |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कु | म्भ | यो | नि | र | लं | का | रं |
| त | स्मै | दि | व्य | प | रि | ग्र | हम् |
| द | दौ | द | त्तं | स | मु | द्रे | ण |
| पी | ते | ने | वा | त्म | नि | ष्क्र | यम् |
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