भूयस्तपोव्ययो मा भूद्वाल्मीकेरिति सोऽत्यगात् ।
मैथिलीतनयोद्गीतनिःस्पन्दमृगमाश्रमम् ॥

अन्वयः AI वाल्मीकेः भूयः तपः व्ययः मा भूत् इति सः मैथिलीतनयोद्गीतनिःस्पन्दमृगम् आश्रमम् अत्यगात्।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) भूय इति॥ स शत्रुघ्नो मैथिलीतनययोः कुश-लवयोरुद्गीतेन निःस्पन्दमृगं गीतप्रियतया निश्चलहरिणं वाल्मीकेराश्रमम्। भूयः पुनरपि तपोव्ययः संविधानकरणार्थं तपोहानिर्मा भूदिति हेतोः। अत्यगात्। अतिक्रम्य गत इत्यर्थः ॥
Summary AI Thinking, "May there be no further depletion of Valmiki's ascetic power," Shatrughna passed by the hermitage, where the deer stood motionless, captivated by the songs of Sita's sons.
सारांश AI वाल्मीकि के तपोबल का व्यय न हो, इस विचार से शत्रुघ्न ने उस आश्रम को चुपचाप पार किया जहाँ सीता के पुत्रों के गायन से मृग भी मन्त्रमुग्ध होकर खड़े थे।
पदच्छेदः AI
भूयःभूयस् further
तपःतपस् (१.१) of penance
व्ययःव्यय (१.१) expenditure
मामा not
भूत्भूत् (√भू कर्तरि लुङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) may be
वाल्मीकेःवाल्मीकि (६.१) of Valmiki
इतिइति thus
सःतत् (१.१) he
अत्यगात्अत्यगात् (अति√इ कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) passed by
मैथिलीतनयोद्गीतनिःस्पन्दमृगम्मैथिलीतनयउद्गीतनिःस्पन्दमृग (२.१) where the deer were motionless from the songs of Sita's sons
आश्रमम्आश्रम (२.१) the hermitage
छन्दः अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
भू स्त पो व्य यो मा भू
द्वा ल्मी के रि ति सो ऽत्य गात्
मै थि ली यो द्गी
निः स्प न्द मृ मा श्र मम्
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