अन्वयः
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तत्र सौध-गतः (सः) चक्रवाकिनीम्, भूमेः हेम-भक्तिमतीम् प्रवेणीम् इव (स्थिताम्) यमुनाम् पश्यन् पिप्रिये ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
तत्रेति॥ तत्र मथुरायां सौधगतो हर्म्यारूढः स चक्रवाकिनीं चक्रवाकवतीं यमुनाम्। हेमभक्तिमतीं सुवर्णरचनावतीं भूमेः प्रवेणीं वेणीमिव।
वेणिः प्रवेणी इत्यमरः। पश्यन्पिप्रिये प्रीतः। प्रीङ् प्रीणने इति धातोर्दैवादिकाल्लिट् ॥
Summary
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There, having gone to his palace terrace, he was pleased watching the Yamuna river, which was full of Chakravaka birds and looked like the earth's single braid of hair, adorned with golden patterns.
सारांश
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वहाँ महलों में बैठे हुए शत्रुघ्न चक्रवाक पक्षियों से युक्त यमुना को देखकर प्रसन्न होते थे, जो पृथ्वी की सुवर्णमयी रेखा वाली वेणी के समान लगती थी।
पदच्छेदः
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| तत्र | तत्र | There |
| सौधगतः | सौध–गत (√गत+क्त, १.१) | having gone to the palace terrace |
| पश्यन् | पश्यत् (√दृश्+शतृ, १.१) | seeing |
| यमुनां | यमुना (२.१) | the Yamuna river |
| चक्रवाकिनीम् | चक्रवाकिनी (२.१) | abounding with Chakravaka birds |
| हेमभक्तिमतीं | हेम–भक्तिमती (२.१) | adorned with golden patterns |
| भूमेः | भू (६.१) | of the earth |
| प्रवेणीमिव | प्रवेणी (२.१)–इव | like a single braid of hair |
| पिप्रिये | पिप्रिये (√प्री कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was pleased |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | त्र | सौ | ध | ग | तः | प | श्य |
| न्य | मु | नां | च | क्र | वा | कि | नीम् |
| हे | म | भ | क्ति | म | तीं | भू | मेः |
| प्र | वे | णी | मि | व | पि | प्रि | ये |
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