अन्वयः
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या स्वर्ग-अभिष्यन्द-वमनम् कृत्वा इव उपनिवेशिता (सती) सौराज्य-प्रकाशाभिः पौर-विभूतिभिः बभौ ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
येति॥ या पूः। शत्रुघ्नः शोभनो राजा यस्याः पुरः सा सुराज्ञी, सुराज्ञ्या भावः सौराज्यम्। तेन प्रकाशाभिः प्रकाशमानाभिः पौराणां विभूतिभिरैश्वर्यैः। स्वर्गस्याभिष्यन्दोऽतिरिक्तजनस्तस्य वमनमाहरणं कृत्वा, उपनिवेशितोपस्थापितेव बभौ। अत्र कौटिल्यः-
भूतपूर्वमभूतपूर्वं वा जनपदं परदेशप्रवाहेण स्वदेशाभिष्यन्दवमनेने वा निवेशयेत् इति ॥
Summary
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That city, founded as if by disgorging the overflow of heaven, shone with the prosperities of its citizens, which were made manifest by good governance.
सारांश
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वह नगरी श्रेष्ठ शासन से सुशोभित नागरिक ऐश्वर्य के कारण ऐसी प्रतीत होती थी, मानो स्वर्ग के बढ़े हुए भाग को उतारकर वहां बसा दिया गया हो।
पदच्छेदः
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| या | यद् (१.१) | Which (city) |
| सौराज्यप्रकाशाभिः | सौराज्य–प्रकाशा (३.३) | by splendors manifest of good governance |
| बभौ | बभौ (√भा कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | shone |
| पौरविभूतिभिः | पौर–विभूति (३.३) | with the prosperities of the citizens |
| स्वर्गाभिष्यन्दवमनं | स्वर्ग–अभिष्यन्द–वमन (२.१) | the disgorging of the overflow of heaven |
| कृत्वेव | कृत्वा (√कृ+क्त्वा)–इव | as if having made |
| उपनिवेशिता | उपनिवेशिता (उप+नि√विश्+णिच्+क्त, १.१) | was founded |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| या | सौ | रा | ज्य | प्र | का | शा | भि |
| र्ब | भौ | पौ | र | वि | भू | ति | भिः |
| स्व | र्गा | भि | ष्य | न्द | व | म | नं |
| कृ | त्वे | वो | प | नि | वे | शि | ता |
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