अन्वयः
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सः शत्रुः कार्ष्णेन पत्रिणा भिन्न-हृदयः (सन्) पतन् भुवः कम्पम् अनिनाय, आश्रम-वासिनाम् (भयम्) जहार च ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
कार्ष्णेनेति॥ स शत्रुर्लवणः। कार्ष्णेन वैष्णवेन पत्रिणा बाणेन। उक्तं च रामायणे-
एवमेष प्रजनितो विष्णोस्तेजोमयः शरःइति। विष्णुर्नारायण कृष्णः इत्यमरः। भिन्नहृदयः पतन्, भुवः कम्पमानिनायानीतवान्। देहभारादित्यर्थः। आश्रमवासिनां कम्पं जहार। तन्नाशादकुतोभया बभूवुरित्यर्थः॥
Summary
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That enemy, his heart pierced by an iron arrow, caused the earth to tremble as he fell, and by his fall, he removed the fear of the hermitage-dwellers.
सारांश
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भगवान विष्णु के उस बाण से हृदय विदीर्ण होने पर जब वह शत्रु गिरा, तब उसके गिरने से पृथ्वी कांप उठी और आश्रमवासियों का भय दूर हो गया।
पदच्छेदः
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| कार्ष्णेन | कार्ष्ण (३.१) | by an iron |
| पत्रिणा | पत्रिन् (३.१) | arrow |
| शत्रुः | शत्रु (१.१) | the enemy |
| स | तद् (१.१) | he |
| भिन्नहृदयः | भिन्न (√भिन्न+क्त)–हृदय (१.१) | with his heart pierced |
| पतन् | पतत् (√पत्+शतृ, १.१) | falling |
| अनिनाय | अनिनाय (आ√नी कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | caused |
| भुवः | भू (६.१) | of the earth |
| कम्पं | कम्प (२.१) | a tremor |
| जहार | जहार (√हृ कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | removed |
| आश्रमवासिनाम् | आश्रम–वासिन् (६.३) | of the hermitage-dwellers |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| का | र्ष्णे | न | प | त्रि | णा | श | त्रुः |
| स | भि | न्न | हृ | द | यः | प | तन् |
| अ | नि | ना | य | भु | वः | क | म्पं |
| ज | हा | रा | श्र | म | वा | सि | नाम् |
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