अन्वयः
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इति शत्रुघ्नम् संतर्ज्य राक्षसः तत्-जिघांसया मुस्ता-स्तम्बम् इव प्रांशुम् द्रुमम् उत्पाटयामास ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
नेति॥ इतीति॥ युग्मम्। राक्षसो लवणः। अद्य मत्कुक्षेः। भुज्यत इति भोजनम्। भोज्यं मृगादिकं नातिपर्याप्तमनतिसमग्रमालक्षअय दृष्ट्वा भीतेनेव धात्रा दिषअट्या भाग्येन मे त्वमुपपादितः कल्पितोऽसि। इति शत्रुघ्नं संतर्ज्य तस्य शत्रुघ्नस्य जिघांसया हन्तुमिच्छया प्रांशुमुन्नतं द्रुमम्। मुस्तास्तम्बमिव अक्लेशेनोत्पाटयामास ॥
Summary
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Having thus threatened Shatrughna, the Rakshasa, with the intent to kill him, uprooted a tall tree as if it were a clump of musta grass.
सारांश
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शत्रुघ्न को डराकर राक्षस ने उन्हें मारने की इच्छा से एक विशाल वृक्ष को घास के तिनके की तरह उखाड़ लिया।
पदच्छेदः
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| इति | इति | Thus |
| संतर्ज्य | संतर्ज्य (सम्√तर्ज्+ल्यप्) | having threatened |
| शत्रुघ्नं | शत्रुघ्न (२.१) | Shatrughna |
| राक्षसः | राक्षस (१.१) | the Rakshasa |
| तज्जिघांसया | तद्–जिघांसा (३.१) | with the desire to kill him |
| प्रांशुम् | प्रांशु (२.१) | a tall |
| उत्पाटयामास | उत्पाटयामास (उद्√पट् +णिच् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | uprooted |
| मुस्तास्तम्बमिव | मुस्ता–स्तम्ब (२.१)–इव | like a clump of musta grass |
| द्रुमम् | द्रुम (२.१) | a tree |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | ति | सं | त | र्ज्य | श | त्रु | घ्नं |
| रा | क्ष | स | स्त | ज्जि | घां | स | या |
| प्रां | शु | मु | त्पा | ट | या | मा | स |
| मु | स्ता | स्त | म्ब | मि | व | द्रु | मम् |
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